What is food Philosophy of india

खरीफ एवं रबी
(KHARIF AND RABI)

FOOD PHILOSOPHY OF INDIA
FOOD PHILOSOPHY OF INDIA 

Difference between rabi and kharif crops in hindi:-

➥ भारत की फसल ऋतु को समझने के लिए कुछ विशेष निश्चित पद उपयोग किए जाते हैं।

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➥ भारत में कृषि फसल वर्ष जुलाई से जून के बीच होता है।

➥ भारत के फसल ऋतुओं को दो मुख्य ऋतुओं के नाम से वर्गीकृत किया गया है, जो हैं-खरीफ एवं रबी।

➥ ये दोनों मानसून पर आधारित होते हैं।

➥ खरीफ फसल ऋतु जुलाई से अक्टूबर के दौरान दक्षिण-पश्चिम/ग्रीष्म मानसून एवं रबी फसल ऋतु अक्टूबर से मार्च के दौरान उत्तर-पूर्व/शीत मानसून में रहती है।

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➥ फसलें, जो मार्च एवं जून के बीच उपजायी जाती हैं, जायद के नाम से जानी जाती हैं।

➥ पाकिस्तान एवं बांग्लादेश दो अन्य देश हैं, जो अपने कृषि प्रारूप में खरीफ एवं रबी नामक पदों का उपयोग करते हैं।

➥ खरीफ एवं रबी नामक पदों का मूल स्रोत अरबी भाषा है जहां खरीफ का अर्थ हेमन्त (Autumn) तथा रबी का अर्थ बसंत (Spring) होता है।

Examples of kharif and rabi crops:-

➥ खरीफ की फसलों के अन्तर्गत चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का, कपास, तिल, गन्ना, सोयाबीन एवं मूंगफली इत्यादि प्रमुख हैं, जबकि रबी की फसलों के अन्तर्गत गेहूं, जौ, चना इत्यादि मटर एवं सरसों इत्यादि प्रमुख हैं।

भारत का खाद्य दर्शन
(FOOD PHILOSOPHY OF INDIA)

भारत के खाद्य दर्शन को सामान्यतः तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है, जिनके उद्देश्य तथा चुनौतियाँ एक-दूसरे – से भिन्न हैं। ये चरण निम्नलिखित हैं:-

प्रथम चरण (The First Phase):-

इस चरण की अवधि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पहले तीन दशकों तक थी।

इस चरण का उद्देश्य खाद्यान्न की आवश्यकताओं को उत्पादन के जरिए पूरा करना था – इस तरह ‘खाद्यान्न तक भौतिक पहुँच’ (Physical aceess to foodgrains) प्राप्त करना था।

इस चरण के अंत तक हरित क्रान्ति के विचार ने इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए भारत को आंतरिक आत्मविश्वास दिया।

1980 के दशक के अंत तक भारत इस मामले में आत्मनिर्भर हो गया।

द्वितीय चरण (The Second Phase):-

जब भारत अपने पहले चरण की सफलता की खुशी मना रहा था तभी एक नई चुनौती देश के समक्ष उठ खड़ी हुई –

“खाद्यान्न तक आर्थिक पहुँच” (Economic access to foodgrains) की चुनौती से स्थिति बदतर होती गई तथा वर्ष 2000 के शुरुआत में एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई,

जहाँ देश में एक ओर सुरक्षित भंडार से तीन गुना अधिक खाद्यान्न के भंडार थे, लेकिन दूसरी ओर कई राज्यों में भुखमरी के कारण लोगों की मौत हो रही थी।

यह भारत के कल्याणकारी राज्य होने का तथा हरित क्रांति की सफलता का मजाक था।

12 सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप तब किया जब एक जनहित याचिका पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज (PUCL) द्वारा दायर की गयी।

राष्ट्रीय स्तर पर काम के बदले अनाज योजना की शुरुआत की गई (अब इस योजना का विलय राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के साथ होगा)।

न्यायालय का यह कहना था कि सरकार की जवाबदेही उन मामलों में होगी, जब बाजार में खाद्यान्न की कीमतों के प्रबंधन के लिए उसे भंडार में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाएगा

या फिर सागर में नष्ट कर दिया जाएगा या फिर केंद्र गेहूँ को सस्ती कीमतों पर निर्यात करेगा।

इस प्रक्रिया में भारत विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा गेहूँ का निर्यातक बन गया (2002)।

वस्तुतः हम गेहूँ के उस हिस्से का निर्यात कर रहे थे, जिसे खाद्यान्न तक आर्थिक पहुँच की कमी के कारण कई भारतीय उपभोग नहीं कर पा रहे थे।

यदि हरित क्रान्ति के निवेश महंगे थे तो स्वभाविक रूप से निर्गत भी महंगे थे।

हरित क्रांति द्वारा खाद्यान्न की उपज तो बढ़ी लेकिन इसके उत्पाद अपेक्षाकृत महंगे थे, जो उपभोक्ता की क्रयशक्ति के बाहर होने लगे।

इस स्थिति से निपटने के लिए एक समयबद्ध तथा उद्देश्य-अभिमुख समष्टि आर्थिक नीति की आवश्यकता थी, जिससे लोगों के क्रयशक्ति में तुलनात्मक रूप से वृद्धि हो सके ताकि वे खाद्यान्न का खर्च वहन कर सकें।

भारत इस संदर्भ में विफल रहा है। स्थिति को सँभालने की कोशिश खाद्यान्न पर अधिक छूट देकर की गई, लेकिन फिर भी कुछ लोगों की क्रयशक्ति में वृद्धि नहीं हो सकी तथा उनके पास भूख से मृत्यु के सिवाय और कोई विकल्प नहीं बचा था।

भारत अभी भी इस चरण से गुजर रहा है तथा सरकार के द्वारा दो तरीकों से स्थिति से निपटने का प्रयास किया जा रहा है-

पहला तरीका, लाभकारी रोजगार की संख्या में वृद्धि करना है तो दूसरा, खाद्यान्न की कीमतों को घटाना है (यह बायो प्रौद्योगिकी पर आधारित द्वितीय हरित क्रांति द्वारा संभव है)।

यहाँ इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि खाद्यान्न की आत्मनिर्भरता का सुख भारत के लिए अस्थायी है।

1990 के दशक के मध्य में सरकार ने इस बात को स्वीकार किया कि देश में खाद्यान्न उत्पादन की कमी थी तथा यह जनसंख्या वृद्धि की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पा रहा था अर्थात् भारत अभी भी आवश्यकतानुसार खाद्यान्न की भौतिक पहुँच प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहा है।

तीसरा चरण (The Third Phase):-

1980 के दशक के अंत में विश्व के प्रसिद्ध विशेषज्ञों ने उत्पादन के विभिन्न तरीकों पर प्रश्न चिह्न खड़े किए।

कृषीय गतिविधियाँ उनमें से एक थीं, जो अब उद्योगों पर आधारित होती जा रही थीं (रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, ट्रैक्टर, इत्यादि)।

सभी विकसित देशों ने कृषि को एक उद्योग घोषित कर दिया था।

यह पीछे मुड़कर देखने तथा आत्मविश्लेषण करने का समय था।

1990 के दशक के शुरुआत से ही कई देशों ने उद्योगों, कृषि तथा सेवा के क्षेत्र में विकास के लिए पारिस्थितिकी अनुकूल तरीकों की शुरूआत की।

हरित क्रांति पारिस्थितिकी रूप से अरक्षणीय थी तथा विश्व ने अब जैव कृषि, हरित कृषि इत्यादि पर जोर देना शुरू किया।

इसका अर्थ यह था कि भारत के समक्ष न केवल “खाद्यान्न तक भौतिक व आर्थिक पहुंच” के उद्देश्य को पूरा करने की चुनौती थी बल्कि इस बात पर भी ध्यान रखना जाना था कि बहुमूल्य पारिस्थितिकी तथा जैव-विविधता का किसी भी कीमत पर नुकसान न हो – यह एक नई चुनौती थी।

भारत में एक नए किस्म की हरित क्रांति की आवश्यकता थी, जिसके द्वारा खाद्यान्न तक भौतिक, आर्थिक एवं पारिस्थितिकी पहुंच हासिल की जा सकेगी।

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