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TWIN BALANCE SHEET CRISES

What is twin balance sheet Upsc?

दोहरी बैलेंस शीट का संकट

(TWIN BALANCE SHEET CRISES)
TWIN BALANCE SHEET CRISES
दोहरी-बैलेंस-शीट

परिचय (Introduction):-

What is twin balance sheet crisis?

➥ बैंकों की फंसी हुई संपत्तियां (एनपीए), खासतौर पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (पीएसबी), पिछले कुछ वर्षों से अत्यधिक ऊंची होने की वजह से खबरों में रहीं।

➥ आरबीआई द्वारा उठाए गए विभिन्न कदम संकट को सुलझाने में तकरीबन असफल रहे।

➥ इस दौरान, कर्ज से दबी हुई निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियां अपनी कमाई में गिरावट के चलते खबरों में रहीं।

➥ आधारभूत ढांचे से लेकर स्टील एवं रियल एस्टेट तक फैली हुई ये कॉर्पोरेट इकाइयां बैंकों के एनपीए की बड़ी वजह हैं।

➥ इसका मतलब उपचार सिर्फ बैंकों को संकट मुक्त बनाने तक सीमित नहीं है बल्कि इसी तरह के उपचार की निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र को भी आवश्यकता है।

समस्या (The Problem):-

यद्यपि, भारत इस समय विश्व में तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, पिछले कुछ वर्षों में कुछ वित्तीय मामले बद से बदतर होते गये हैं।

2007 के वैश्विक वित्तीय मंदी (जीएफसी) के बाद, भारत ‘दोहरी बैलेंस शीट’ (टीबीएस) की समस्या की जकड़ से मुक्त होने की कोशिश कर रहा है:

  1. पीएसबी के ऊंचे एनपीए, और;
  2. निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र की ऊंची संकटग्रस्त बैलेंस शीट।

बैंकों के बुरे कर्ज को बहाल और नियंत्रित करने के लिए भारत अब तक कई कदम उठा चुका है लेकिन वे बहुत प्रभावी नहीं रहे और बैंक अब भी बहुत संकट में हैं।

दूसरी तरफ, भारत कॉर्पोरेट क्षेत्र की बैलेंस शीट के अच्छी हालत में आने का इंतजार करता रहा लेकिन यह नहीं हो पाया।

इस दौरान समय के साथ हालात और बिगड़ते गए:-

  1. पहले से संगटग्रस्त निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र अपने संचालन के लिए और अधिक ऋण लेने पर मजबूर रहे, क्योंकि उनकी कमाई और भी खराब हो चुकी थी।
  2. जीएफसी के समय से सितंबर 2016 तक, 10 शीर्ष संगटग्रस्त कॉर्पोरेट समूहों का कर्ज पांच गुना-7.5 लाख करोड़ से भी अधिक हो गया था।
  3. ये कंपनियां अपने कर्ज का न्यूनतम भुगतान करने में भी कठिनाइयां झेल रही हैं। फिलहाल, पीएसबी के कुल ऋण का करीब 12 फीसदी एनपीए में बदल गया है।
  4. यदि निजी क्षेत्र के कुछ अनुमानों पर विश्वास किया जाए तो ये एनपीए कहीं ऊंचे हैं (करीब 16 फीसदी)।

समाधान (The Solution):-

टीबीएस ने अर्थव्यवस्था पर अपना नकारात्मक प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है- निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र को अपने निवेश को नियंत्रित करना पडा है जबकि बैंकों को अपने ऋण का आकार कम करना पड़ा हैं।

➥ स्थायी वृद्धि के लिए, इन रुझानों को पलटने की जरूरत है। यह करने का एकमात्र तरीका मौजूदा बैलेंस शीट समस्या का समाधान करना ही है।

➥ टीबीएस के मुद्दे को सुलझाने के लिए आर्थिक समीक्षा 2016-17 अलग उपाय अपनाने का सुझाव देता है।

केंद्रीकृत ‘सार्वजनिक क्षेत्र परिसंपत्ति पुनरुद्धार संस्था’ पारा (PARA) के मुताबिक संस्था बड़े और सबसे मुश्किल मुद्दों का जिम्मा ले सकती है, और ऋण को कम करने के लिए कठोर राजनीतिक फैसले ले सकती है।

➥ अब तक, टीबीएस को सुलझाने की औपचारिक रणनीति (एक ‘विकेंद्रिकृत दृष्टिकोण’) अपनायी जाती रही है, जिसके तहत बैंकों को ही ‘पुनर्निर्माण’ के फैसलों की जिम्मेदारी दी गई थी।

➥ आरबीआई द्वारा इस तरह की कई योजनाएं लाई गईं। ज्यादातर समय यह वास्तव में यह एक बेहतर रणनीति रही।

➥ लेकिन मौजूदा हालात में, इसकी प्रभावशीलता भ्रमित करने वाली साबित हुई है क्योंकि बैंक इस समस्या के विशाल आकार के तले दब गए हैं।

➥ संभवतः समय आ गया है कि एक ‘केंद्रीकृत उपाय’ – पारा के समर्थन में कुछ बिंदु नीचे दिए गए हैं:-

बैंकों के साथ कंपनियां भी:-

  1. साधरणतया, बुरे कर्ज की चर्चा आमतौर पर बैंक की पूंजी पर केंद्रित होती है, जैसे कि टीबीएस मामले को सुलझाने में मुख्य बाधा पीएसबी की जरूरत की खातिर धन जुटाना है (हम सरकार को 2012-13 से ही बैंक को पुनः पूंजी मुहैया कराते देखते हैं)।
  2. यदि इस पूंजी को गतिशील कर दिया जाए (संभव है जीडीपी का तीन फीसदी तक हो) तो यह सिर्फ बैंकों को खतरे से बाहर आने में मदद करेगा
  3. लेकिन संकटग्रस्त निजी कॉर्पोरेट इकाइयों को नहीं (जो इस संकट के पीछे हैं)।
  4. इन कॉर्पोरेट के लिए भी स्थायी उपचार की जरूरत है।

आर्थिक न कि नैतिक समस्याः-

  1. जब भी टीबीएस समस्या पर आम चर्चा शुरू होती है, यह ‘क्रोनी’ कैपिटलिज्म (अपने फायदों के लिए उद्यमियों और सरकारी अधिकारियों के बीच घनिष्ठ रिश्तों से बनी आर्थिक व्यवस्था) के मुद्दे से जुड़ी होती है और यह ठीक भी दिखता है
  2. क्योंकि कई बार निधि के छितराव की वजह से कर्ज के पुनर्भगुतान की समस्या आती है।
  3. लेकिन दूसरे आयाम को भी ध्यान में रखना चाहिए- समस्या की मुख्य वजह ‘आर्थिक माहौल में उम्मीद के विपरीत आए बदलाव’ हैं,
  4. जैसे कि, कर्ज की समय सीमा, विनिमय दर और वृद्धि दर के अनुमान बुरी तरह से गलत साबित हुए। इसलिए समस्या नैतिक नहीं बल्कि आर्थिक है।
  5. ‘क्रोनी’ कैपिटिलिज्म की बात बार-बार दोहराने से हो सकता है कि कुछ को दंड मिल जाए लेकिन यह हमें प्रोत्साहन-आधारित उपचारों की दिशा में विचार करने में असफल कर देगा।

चिंताजनक कर्जः-

  1. संकटग्रस्त कर्ज बड़े पैमाने पर बड़ी कंपनियों में केंद्रीभूत हैं, जो कि एक मौके की तरह लगता है क्योंकि अपेक्षकृत कम संख्या में मामलों को सुलझाने की जरूरत है।
  2. लेकिन बड़े मामले सुलझाना स्वाभाविक रूप से बहुत कठिन है और ये एक तरह की चुनौती होंगे।

कर्ज में कटौतीः-

  1. इनमें से बहुत-सी कंपनियां कर्ज के मौजूदा स्तर पर बेहद कमजोर हैं और इनके कर्ज को कम किए जाने की जरूरत है।
  2. यह माना गया कि उनको वापस खड़ा करने के लिए करीब 50 फीसदी तक कर्ज कम किए जाने (Write off) की आवश्यकता है।

बैंकों की मुश्किल:-

  1. एनपीए के मामलों को सुलझाने में बैंकों ने मुश्किलें झेली हैं, हालांकि आरबीआई ने उन्हें कई विकल्प दिए हैं।
  2. दूसरे मुद्दों के अलावा, वे समन्वय की बड़ी कमी की समस्या का भी सामना करते हैं, चूंकि बड़े देनदारों के कई सारे लेनदार होते हैं जिनके अपने-अपने हित होते हैं।
  3. अगर पीएसबी बड़े कर्ज में कटौती (Write off) देने के बारे में विचार करें तो यह जांच एजेंसियों का ध्यान खींच सकता है।
  4. कर्ज की भुगतान सूची दोबारा बनाने के लिए, कर्ज को इक्विटी में बदल कर या कंपनियों का अधिग्रहण कर और आगे उन्हें किसी भावी खरीदार को बेचा जा सकता है लेकिन वे इसे घाटे में बेचते हैं तो ये राजनीतिक रूप से कठिन होगा।

एआरसी का व्यर्थ सिद्ध होनाः-

  1. परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियां (एआरसी) बुरे कर्ज के विघटन में बैंकों से ज्यादा सफल सिद्ध नहीं हुईं और बड़े मामलों को निपटाने के लिए बहुत छोटी हैं।
  2. एआरसी और बैंक काफी विकृत हो सकते हैं, उदाहरण के तौर पर, बुरे कर्ज को निपटाने के लिए एआरसी प्रबंधन शुल्क लेती रहती हैं, तब भी जब वे उन्हें निपटा नहीं पातीं।
  3. नए दिवालिया कानून (2016-17 में बना कानून) के तहत अभी काम शुरू होना है- इसके तहत काम शुरू करने के बाद भी बड़े मामलों से निपटने के लिए यह तैयार हो सकें, इससे पहले आवश्यक समय की जरूरत होगी।
  4. देर महंगी पड़ती है। चूंकि बैंक बड़े मामलों को नहीं सुलझा सकते इसलिए उन्होंने कर्जदारों को केवल दोबारा वित्त मुहैया करा देते हैं और दरअसल ‘समस्या के प्रति आंखें मूंद लेते हैं। 
  5. लेकिन यह सरकार के लिए महंगा पड़ता है, क्योंकि इसका मतलब होता है बुरे कर्ज का बढ़ते रहना, बैंकों को धन मुहैया कराने पर सरकार के लिए लागत बढ़ना और इससे जुड़ी राजनीतिक कठिनाइयां भी।

‘पारा’ की कार्यपद्धति
(Functioning of PARA)

➥ मोटे तौर पर सिद्धांत साधारण है हालांकि इसके संभावित नतीजे कई हैं।

➥ यह बैंकों से विशिष्ट कर्ज को खरीदेगा (उदाहरण के तौर पर, कर्ज में डूबी बड़ी आधारभूत ढांचों से जुड़ी इकाइयों से सम्बद्ध) और उस पर काम करेगा, यह मूल्य को बढ़ाने की रणनीति के पेशेवर आकलन पर निर्भर करता है।

➥ एक बार कर्ज पीएसबी के खातों से बाहर हो जाए तो सरकार उन्हें दोबारा धन दे सकती है, इसके बाद उन्हें नए कर्ज के लिए अपने संसाधनों (वित्तीय और मानव) को इस्तेमाल करने की अनुमति दी जा सकती है।

➥ इसी तरह, एक बार जब कर्ज में डूबे उपक्रम दोबारा वित्तीय तौर पर मजबूत हो जाएं तो वे अपने कार्य-संचालन पर दोबारा ध्यान केंद्रित कर पाएंगे, (अपनी वित्तीय व्यवस्था के बजाय) और वे नए निवेश और कर्ज के लिए वित्तीय तौर पर सक्षम हो जाएंगे।

नैतिक बाधाएंः-

  1. निःसंदेह इस तरह के कदम को नैतिक दुविधा का सामना करना पड़ता है, इस सबकी कीमत चुकानी पड़ती है जो नुकसान को स्वीकार करना और उसके लिए भुगतान करना है।
  2. लेकिन यह कीमत चुकानी ही है। कर्ज पहले ही लिए जा चुके हैं, नुकसान भी हो चुका है और क्योंकि पीएसबी प्रमुख ऋणदाता हैं, बोझ का काफी हिस्सा सरकार पर पड़ेगा (यद्यपि संकटग्रस्त उपक्रमों में शेयरधारकों को उनकी हिस्सेदारी खोनी पड़ेगी)।
  3. समाधान की किसी भी रणनीति (पारा या विकेंद्रित) के लिए मुद्दा ये नहीं है कि सरकार को नई देनदारी लेनी चाहिए बल्कि ये है कि देनदारी को कैसे कम-से-कम किया जाए जो बुरे ऋण की समस्या को जितना संभव हो प्रभावी तरीके से सुलझाने की वजह से सामने आई है और दरअसल यही पारा के निर्माण का उद्देश्य है।

आवश्यकताएं:-

  • ➧इसके लिए बड़ी पूंजी की जरूरत होगी, जिसका प्रबंध निम्नलिखित तरीकों से किया जा सकता है:-

  1. इसका पहला और सबसे महत्वपूर्ण स्रोत सरकार (प्रतिभूतियां जारी कर) हो सकती है;
  2. दूसरा स्रोत पूंजी बाजार हो सकता है (यदि पीएसबीएस में शेयर बेचे जाएं या निजी क्षेत्र पारा में हिस्सेदारी खरीदें),
  3. पूंजी का तीसरा स्रोत आरबीआई हो सकता है (केंद्रीय बैंक कुछ सरकारी प्रतिभूतियां पीएसबी और पारा को स्थानांतरित कर सकता है – इससे आरबीआई की पूंजी कम हो जाएगी और पीएसबीएस, पारा की पूंजी बढ़ जाएगी। इससे मौद्रिक नीति पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि कोई नया धन सृजित नहीं किया गया है)।

जोखिम और कठिनाइयां:-

  1. पारा का निर्माण बिना इसकी अपनी कठिनाइयों और जोखिमों के नहीं हुआ, देश का इतिहास सार्वजनिक क्षेत्र के प्रयासों के पक्ष के अनुकूल नहीं है।
  2. फिर भी, कोई यह पूछ सकता है कि भारत कब तक हालिया विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण के साथ चल सकता है, जो जीएफसी के आठ वर्षों के बाद भी अब तक इच्छित परिणाम नहीं दे सका है,
  3. जबकि पूर्व एशियाई देश अपनी ज्यादा बड़ी टीबीएस समस्याओं को दो वर्ष के भीतर सुलझाने में सक्षम हो गए।
  4. वास्तव में एक कारण यह था कि पूर्व एशियाई देश कहीं अधिक दबाव में थे जिसकी वजह से वे संकट में थे, जबकि भारत की वृद्धि दर उच्च बनी रही है।
  5. लेकिन एक महत्वपूर्ण कारण था कि इसने एक केंद्रीकृत रणनीति अपनाई, जो सार्वजनिक संपत्ति पुनर्वास कंपनियों का उपयोग कर ऋण की समस्याओं को सुलझाने की अनुमति प्रदान करती है।
  6. परिणामतः, हालिया प्रयास टीबीएस समस्या सुलझाने में सफल नहीं हो सके। नए समाधान तलाशने की जरूरत है। संभवतः भारत को फिलहाल पारा को एक समाधान के तौर पर देखना चाहिए।
  7. यह पद्धति ऋण समाधान में तकलीफ दे रही मौजूदा अधिकतर बाधाओं को खत्म कर सकती है:-
  • करों के एक ऐजेंसी में केंद्रीकृत होने से यह समन्वय की समस्या को सुलझा सकता है,
  • एक तय समय सीमा में अधिकाधिक वसूली के लिए एक सुस्पष्ट आदेश देकर इसे समुचित प्रोत्साहन के साथ स्थापित किया जा सकता है,
  • यह बैंक पूंजी संबंधी चिंताओं से ऋण समाधान प्रक्रिया को अलग कर सकता है।

➥ मध्य-2017 में सरकार ने इस दिशा में पहल करने का संकेत दिया था हालांकि संघीय बजट 2018-19 इस मामले में कोई खुलासा नहीं करता है।

➥ फिलहाल सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र बैंकों को पुनर्पूजीकृत करने की प्रक्रिया पर कार्य किया जा रहा है-अक्तूबर 2017 में घोषित इस योजना के अंतर्गत बैंकों को 2.11 लाख करोड़ की पूंजी दिए जाने की व्यवस्था है।

➥ यह प्रक्रिया दोहरे बैलेंस शीट संकट के अर्द्ध-भाग (बैंकों की) की दिशा में कुछ समाधान ला सकेगा।

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