राजस्थान का दक्षिणी पूर्वी पठारी प्रदेश (southern eastern plateau region)

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राजस्थान का दक्षिणी पूर्वी पठारी प्रदेश

राजस्थान का दक्षिणी पूर्वी पठारी प्रदेश
राजस्थान का दक्षिणी पूर्वी पठारी प्रदेश

इस प्रदेश का विस्तार राज्य के कोटा संभाग में है।
इस क्षेत्र में हाड़ा चौहानों का शासन था, अतः यहां बोली जाने वाली बोली हाडौती बोली है। इस कारण यह प्रदेश हाडौती का पठार कहलाया।
राज्य के इस भौतिक विभाग के अन्तर्गत राज्य की कुल जनसख्या का 11% भाग निवास करता है।
यह प्रदेश राज्य के कुल क्षेत्रफल का 6.89% (लगभग 7%) है।
नोट :- यह प्रदेश अरावली पर्वतमाला तथा विन्ध्याचल पर्वत को जोडता है, इस कारण इस प्रदेश को सक्रांति प्रदेश कहा जाता है।
हाडौती के पठार का विस्तार राज्य में चम्बल नदी के सहारे पूर्वी भाग में है।
यह प्रदेश राज्य के भौतिक विभागों में सर्वाधिक वर्षा वाला भौतिक विभाग है।

हाडौती का पठार

अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से हम हाडौती के पठार को दो भागों में विभाजित करते है-

1. विन्ध्यन कगार भूमि

2. दक्कन लावा का पठार

नोट :- राज्य के दक्षिणी पूर्वी हाडौती का पठार मालवा के पठार के उत्तर पश्चिम का भाग है जबकि मालवा का पठार दक्षिण भारतीय प्रायद्धीपीय पठार का भाग है।

नोट :- मध्यप्रदेश तथा राजस्थान में संयुक्त रूप से विस्तृत पठार को मालवा का पठार कहते है

विन्ध्य कगार भूमि :- विन्ध्य कगार भूमि का विस्तार राज्य के बूंदी, सवाई माधोपुर तथा करौली जिले में स्थित है। इस क्षेत्र में विन्ध्य कगार भूमि की चट्टानें पाई जाती है।

नोट :- इस क्षेत्र के अन्तर्गत धौलपुर जिले में लाल-बलुआ पत्थर, करौली जिले में लाल-गुलाबी पत्थर, भीलवाड़ा जिले के बिजौलिया क्षेत्र में पट्टीया या कत्तलें, चित्तौड़गढ़ जिले के मानपुरा में पट्टीयां, प्रतापगढ़ के केसरपुरा में हीरें के लिये प्रसिद्ध है।

इस क्षेत्र के अन्तर्गत राज्य के करौली, धौलपुर तथा सवाई माधोपुर क्षेत्र में डांग का विस्तार है, जबकि सवाई मधोपुर तथा करौली जिले में बीहड़ भूमि का विस्तार है।

दक्कन लावा का पठार :- यह क्षेत्र ज्वालामुखी से निर्मित है। इस क्षेत्र की संरचना दक्कन ट्रेप लावा शैल समूह के समान है। अतः इसे दक्कन लावा का पठार कहा जाता है।

ज्वालामुखी द्वारा निर्मित होने के कारण इस क्षेत्र में पाई जाने वाली मिट्टी मध्यम काली मिट्टी है।

नोट :- इस क्षेत्र की मिट्टी में बेसाल्ट तत्व की प्रधानता होती है। इस मिट्टी में नाइट्रोजन भरपूर मात्रा में पाई जाती है। अतः इस मिट्टी को रासायनिक खाद की अधिक आवश्यकता नही होती है। मध्यम काली मिट्टी कपास की फसल के लिये उपयुक्त मिट्टी होती है, अतः इस मिट्टी को कपासिय मिट्टी भी कहते है।

मालवा के पठार के उप प्रदेश

1. मुकन्दवाड़ा की पहाडियां

2. डग, गंगाधर उच्च भूमि

3. शाहबाद उच्च भूमि

1. मुकन्दवाड़ा की पहाडियां :- दक्षिण कोटा से झालारापाटन तक विस्तृत पहाडियां जो अर्द्धचन्द्राकार पर्वत श्रेणियों का निर्माण करती है, मुकन्दवाड़ा की पहाडियां कहलाती है। इसी क्षेत्र में दर्रा अभ्यारण्य स्थित है, जिसका नाम राज्य सरकार ने मुकन्दरा हिल्स पार्क (राजीव गाँधी नेशनल पार्क) कर दिया था।

2. डग, गंगाधर उच्च भूमि :- झालावाड़ जिले में स्थित दक्षिण-पश्चिम भाग की उच्च भूमि।

3. शाहबाद उच्च भूमि :- बारां जिले के पूर्व में स्थित घोड़े की नाल के आकार की पहाड़ियों को शाहबाद उच्च भूमि कहा जाता है।

पठारी प्रदेष की मुख्य विषेषता एक नजर

जनसंख्या ➡️ 11%

क्षेत्रफल ➡️ 6.89% (लगभग 7%)

जलवायु ➡️ आर्द्र

वनस्पति ➡️ लम्बी घास तथा सागवान के वन

मिट्टी ➡️ मध्यम काली (ज्वालामुखी से निर्मित)

वर्षा ➡️ 80 से.मी. से 120 से.मी.

ठण्डा जिला ➡️ झालावाड़ (राज्य का सर्वाधिक वर्षा वाला भौतिक विभाग)

मुख्य फसल ➡️ कपास तथा सोयाबीन

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