राजस्थान में किसान आन्दोलन (Rajasthan me Kisan Aandolan) (Peasant movement in rajasthan)

 राजस्थान में किसान आन्दोलन
(Rajasthan me Kisan Aandolan)
(Peasant movement in rajasthan)

राजस्थान-में-किसान-आन्दोलन
राजस्थान-में-किसान-आन्दोलन

बिजौलिया किसान आन्दोलन
(Bijaulia Kisan Aandolan)

✔️ राजस्थान में ठिकानों द्वारा ली जाने वाली कर, लाग, बाग, बेगार आदि के विरोध में किसान आन्दोलन प्रारम्भ हुए ।
✔️ बिजौलिया मेवाड़ रियासत का “अ” और प्रथम श्रेणी का ठिकाना था । यह स्थान वर्तमान में भीलवाडा जिले में स्थित है ।

✔️ बिजौलिया ठिकाने का संस्थापक अशोक परमार था । सन् 1527 में खानवा के युद्ध में अशोक परमार ने राणा सांगा की ओर से भाग लिया था ।
✔️ अशोक परमार की वीरता से प्रसन्न होकर राणा सांगा ने उन्हे उपरमाल की जागीर प्रदान की थी।
नोट :- अशोक परमार का सम्बन्ध जगनेर (भरतपुर) से है । वर्तमान में जगनेर (उत्तरप्रदेश) में है ।
✔️ बिजौलिया ठिकाने का जागीरदार गोविन्दराम की मृत्यु के उपरान्त राव कृष्ण सिंह नया जागीरदार बना । बिजौलिया ठिकाने के अन्तर्गत 97 गाँव आते थे जिसमें इसने करों की संख्या बढ़ाकर 84 कर दी, इससे यहां के किसानों में भारी असन्तोष व्याप्त हो गया।
✔️ सन् 1897 में गंगाराम धाकड़ के मृत्युभोज के समय किसान एकत्रित हुए तथा इन्होने जागीरदार की शिकायतों हेतु ठाकरी पटेल तथा नानजी पटेल को प्रतिनिधि के रूप में मेवाड़ महाराणा (फतेह सिंह) के पास भेजा ।
✔️ मेवाड़ महाराणा ने आबिद हुसैन को जाँच के लिये बिजौलिया भेजा ।

✔️ आबिद हुसैन द्वारा बिजोलिया में किसानों पर किये जा रहे अत्याचारों को सही ठहराया । इसके बावजूद भी मेवाड़ महाराणा ने उसकी अनदेखी कर दी ।

✔️ सन् 1903 में कृष्ण सिंह ने मालगाँव के किसानों पर नया कर चंवरी कर लगा दिया । जिसके तहत प्रत्येक किसान को अपनी पत्री का विवाह पर 5 रूपये ठिकाने को देने पडते थे । जनता के भारी विरोध के चलते अन्ततः कृष्ण सिंह को इस कर को वापस tu लेना पड़ा ।

✔️ राव कृष्ण सिंह की मृत्यु के बाद पृथ्वी सिंह बिजौलिया का नया जागीरदार बना । उसने 1906 में तलवार बंधाई/खड्ग बंधाई/नजराना नामक नया कर लगाया, यह एक उत्तराधिकारी शुल्क था ।

✔️ आरम्भ में इस किसान आन्दोलन का नेतृत्व साधु सीताराम दास के हाथों में रहा । पृथ्वीसिंह की मृत्यु के बाद केसरी सिह बिजौलिया का नया जागीरदार बना जो कि अल्पव्यस्क था । इसी समय प्रथम विश्व युद्ध आरम्भ हो गया। इसके तहत युद्धकोष में ठिकानों को धन जमा कराने को मजबूर होना पड़ा । अतः जागीरदारों ने जनता से वसुले जाने वाले करों में वृद्धी कर दी ।

विजय सिंह पथिक व किसान आन्दोलन
(Vijay Singh Pathik and peasant movement)

✔️ विजयसिंह पथिक के बचपन का नाम भूपसिंह था ।

✔️ विजयसिंह पथिक का जन्म 1873 में गुढ़ावली गाँव (उत्तरप्रदेश) राज्य के में हुआ था ।

✔️ आरम्भ में विजय सिह पथिक रास बिहारी बोस के क्रान्ति कारी दल के सदस्य थे ।

✔️ रास बिहारी बोस ने उन्हे राज्य में सशस्त्र क्रान्ति के योजनाकार ठाकुर गोपाल सिंह खरवा का साथ देने हेतु भेजा ।

✔️ भूपसिंह को कैद करके टाड़गढ़ जेल में रखा गया । यहां से यह गुप्त तरीके से वेश बदलकर भाग निकले, तथा अपना नाम परिवर्तित कर विजय सिंह पथिक रख लिया ।

✔️ सन् 1916 में साधु सीताराम दास के कहने पर विजय सिह पथिक ने बिजौलिया किसान आन्दोलन में प्रवेश किया ।

✔️ सीताराम दास व विजय सिह पथिक की प्रथम मूलाकात चित्तौड़गढ़ जिले के औछडी नामक स्थान पर हुई। यही पर इन्होने हरिशंरकर भाई किंकर के साथ विद्या प्रचारिणी सभा की स्थापना की ।

✔️ सन् 1917 में विजय सिह पथिक ने उपरमाल पंचबोर्ड का गठन किया जिसका अध्यक्ष श्री मन्ना भाई पटेल को बनाया गया । धीरे-धीरे इस आन्दोलन का स्वरूप व्यापक हो गया ।

नोट :- कानपुर से प्रकाशित “प्रताप” नामक समाचार पत्र में इस आन्दोलन के समर्थन में भी कई क्रान्तिकारी लेख प्रकाशित किये गये । इस समाचार पत्र के सम्पादक गणेश शंकर विद्यार्थी थे ।
✔️ सन् 1919 में बिन्दू लाल भट्टाचार्य आयोग का गठन किया गया ।
✔️ इसके तहत बन्दी बनाये गये किसानों की रिहाई हुई ।
✔️ सन् 1922 में ए.जी.जी. हालैण्ड के प्रयासों से इस आन्दोलन में कुछ शिथिलता आई ।
✔️ सन् 1927 में आन्दोलन के संचालन के तरीके को लेकर विजय सिह पथिक तथा माणिक्य लाल वर्मा में मतभेद हो गया ।
✔️ इस समय विजय सिह पथिक ने अपने को इस किसान आन्दोलन से अलग कर लिया ।
✔️ सन् 1941 में माणिक्य लाल वर्मा तथा मेवाड़ के तत्कालीन प्रधानमंत्री सर टी. राघवाचार्य के मध्य समझौता हो जाने से इस आन्दोलन का पटाक्षेप हुआ
नोट :- बिजौलिया किसान आन्दोलन भारत का प्रथम अहिसात्मक तथा संगठित किसान आन्दोलन है ।
✔️ बिजौलिया किसान आन्दोलन 1897 में प्रारम्भ होकर 1941 तक अर्थात 44 वर्षों तक चलने वाला सबसे लम्बा किसान आन्दोलन है । इसे भारत का मेराथन कहा जाता है ।
✔️ महात्मा गाँधी ने अपने सचिव महादेव भाई देसाई को किसानों पर किये जा रहे अत्याचारों की जाँच हेतु बिजौलिया भेजा था ।
✔️ स्वतन्त्रता सेनानी माणिक्य लाल वर्मा ने “पंछीड़ा” नामक गीत में किसानों की मर्मदशा का वर्णन किया ।
✔️ सन् 1919 में विजय सिह पथिक ने राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की। इनके द्वारा प्रकाशित समाचार पत्र तरूण राजस्थान व नवीन राजस्थान में भी बिजौलिया किसान आन्दोलन के सन्दर्भ में कई लेख सम्पादित किये ।

बेगूं किसान आन्दोलन
(Begun Farmer’s Movement)

✔️ बेगूं (मेवाड़) में ठिकानों द्वारा ली जाने वाली अत्यधिक मात्रा में लाघ-बाघ व करों के विरोध में किसान आन्दोलन प्रारम्भ हुआ । यहां सिगोंटी व झुम्पी (पशुकर) बेघारी के साथ देना अनिवार्य कर दिया था ।
✔️ सन् 1921 में मेनाल नामक स्थान पर किसानों की एक सभा आयोजित की गई जिसमें ठिकानों को कर देने का विरोध किया गया ।
✔️ रामनारायण चौधरी को बडे किसान के नाम से भी जाना जाता है । अप्रत्यक्ष रूप से इस किसान आन्दोलन का नेतृत्व राजस्थान सेवा संघ कर रहा था ।
✔️ 13 जुलाई 1923 को गोविन्दपुरा गाँव में किसानों की एक सभा आयोजित की गई जिसमें पुलिस की गोलीबारी के चलते रूपाजी व कृपाजी धाकड़ शहीद हो गये ।

नोट :- राष्ट्रीय नेता बाल गंगाधर तिलक ने इस आन्दोलन के बारे में यह कहा है कि “भील तेरा बलिदान व्यर्थ नही जायेगा” |
नोट :- भरतपुर प्रजामण्डल की प्रशंसा करते हुए पट्टाभि सितारमैया ने कहा है कि “भविष्य में न तो राजपूत राजवंश व न ही जाट राजवंश का शासन होगा अब तो जनता का ही शासन होगा”
✔️ मेवाड़ सरकार तथा अंग्रेजी सरकार ने अनुप सिंह तथा राजस्थान सेवा संघ के मध्य हुए समझौतो को बॉल्शेविक फैसले की संज्ञा दी है ।
✔️ ट्रेंच आयोग की सिफारिशों के उपरान्त भूपाल सिंह तथा अनुप सिंह के मध्य समझौता हो जाने से इस किसान आन्दोलन पटाक्षेप हुआ ।

बरड़ या बूंदी किसान आन्दोलन
(Barad or Bundi Peasant Movement)

✔️ बूंदी जिले का दक्षिण-पश्चिमी पथरीला क्षेत्र जो कि मेवाड़ की सीमा को स्पर्श करता है बरड़ कहलाता है ।
✔️ बरड़ क्षेत्र में सर्वप्रथम 1920 में साधु सीताराम दास द्वारा एक किसान पंचायत की स्थापना की गई जिसके अध्यक्ष हरला भड़क को बनाया गया ।

✔️ प्रत्यक्ष रूप से इस किसान आन्दोलन का नेतृत्व पण्डित नयनुराम शर्मा द्वारा किया गया ।

✔️ यह किसान आन्दोलन राज्य के बिजौलिया किसान आन्दोलन से प्रेरित था ।

✔️ 2 अप्रेल 1923 को बूंदी जिले के डाबी नामक स्थान पर किसानों की एक सभा बुलाई गई इस सभा में हरि शंकर भाई किंकर तथा भंवर लाल स्वर्णकार ने भी भाग लिया, इस सभा का शुभारम्भ विजय सिंह पथिक जी द्वारा रचित झण्डा गीत को नानक जी के द्वारा गाकर की गई । इस सभा में पुलिस अधीक्षक इकराम हुसैन ने बिना पूर्व सूचना के गोली-बारी की जिसके चलते नानक जी भील तथा देवी लाल गुर्जर शहीद हो गये ।
नोट :- स्वतन्त्रता सेनानी माणिक्य लाल वर्मा ने शहीद नानक जी भील की स्मृति में अर्जी शीर्षक से गीत लिखा है ।
✔️ इस किसान आन्दोलन में महिलाओं ने भी भाग लिया । यह किसान आन्दोलन पूरी तरह से राज्य सरकार के विरूद्ध था ।

अलवर किसान आन्दोलन
(Alwar Kisan Movement)

✔️ अलवर रियासत में सुअर पाले जाते थे ये किसानों की खड़ी फसल को नुकासान पहुचाते थे इन्हे मारने पर प्रतिबन्ध था अतः सुअरों को मारने की अनुमति को लेकर यहां किसान आन्दोलन प्रारम्भ हुआ |
✔️ 1923-24 के वर्ष में राजस्व में भारी वृद्धी की गई जिसके चलते किसानों में भारी असन्तोष था ।
✔️ अक्टूम्बर 1924 में माधो सिंह तथा गोविन्द सिंह ने पुकार नामक पुस्तिका प्रकाशित की जिसमें किसानों की समस्याओं को उजागर किया गया ।

नीमूचणा हत्याकांड
(Neemuchna massacre)

✔️ अलवर किसान आन्दोलन का प्रमुख केन्द्र नीमूचणा गाँव था । नीमूचणा गाँव वर्तमान में अलवर जिले की बानसूर तहसील में स्थित है । 14 मई 1925 को कमाण्डर छाजु सिंह के नेतृत्व में पुलिस ने बिना पूर्व चेतावनी के गोलीबारी की जिसमें कई किसान घायल हो गये। राजस्थान सेवा संघ द्वारा इस घटना इसकी जाँच करवाई गई । तथा इस घटना को तरूण राजस्थान नामक समाचार पत्र के एक अंक में भी प्रकाशित किया गया ।
नोट :- महात्मा गाँधी ने इस घटना को दोहरी डायरशाही तथा दुसरा जलियाँ वाला बाग हत्याकांड की संज्ञा दी है ।
✔️ इस घटना का देशी रियासतों के इतिहास में वही महत्व है जो कि भारत के इतिहास में जलियाँ वाला बाग हत्याकांड का है ।
✔️ इस घटना का असली खलनायक गोपाल दास नामक एक पंजाबी अधिकारी को माना जाता है । अन्त में अलवर नरेश जय सिंह स्वयं नीमूचणा आये तथा मारे गये लोगों के परिवार को उचित मुआवजा राशि प्रदान की, इस प्रकार यहां किसान आन्दोलन समाप्त हुआ ।

मारवाड़ किसान आन्दोलन
(Marwar Peasant Movement)

✔️ मारवाड़ राज्य का सबसे बड़ा राज्य था । मारवाड़ में 1915 में मरूधर मित्र हितकारिणी नामक राजनैतिक संस्था की स्थापना हुई । इस संस्था ने मारवाड़ में जनजागृति का कार्य किया । मारवाड़ में राजनैतिक जनजागृति का श्रेय जय नारायण व्यास को जाता है ।
✔️ सन् 1920 में चाँदमल सुराणा व अन्य साथियों ने मिल कर राजस्थान सेवासंघ की तर्ज पर मारवाड़ सेवा संघ की स्थापना की गई । सन् 1923 में उस संस्था का नाम बदल कर मारवाड़ प्रजा हितकारिणी सभा कर दिया गया ।
✔️ सन् 1931 में मारवाड़ स्टेट पीपूल्स कान्फ्रेस का एक सम्मेलन चाँदमल सुराणा की अध्यक्षता में राज्य के पुष्कर स्थान पर किया गया । सन 1934 में मारवाड प्रजामण्डल गठित हो चका था ।
✔️ 22 मार्च 1941 को एक किसान सभा की स्थापना की गई, जिसके संगठन कर्ता बलवंत सिंह मेहता थे, तथा उस किसान सभा का अध्यक्ष मंगल सिंह कछावा को बनाया गया ।
✔️ 13 अप्रेल 1947 को डाबला नामक स्थान पर किसान सभा में पुलिस की गोलीबारी के चलते चुन्नी लाल शर्मा, रूपाराम चौधरी राजाराम तथा पन्नाराम शहीद हो गये । इस घटना को डाबला हत्याकांड के नाम से जाना जाता है।

✔️ 6 अप्रेल 1949 को मारवाड़ टीनेन्सी एक्ट पारित किया गया, इस एक्ट के तहत किसानों को उनकी जोतों (जमीन) पर खातेदारी के अधिकार दे दिया गया ।
नोट :- गुन्दोज, रोठू, निमाज, धामली जैसी घटनाओं का सम्बन्ध राज्य के मारवाड़ के किसान आन्दोलन से है।

शेखावाटी किसान आन्दोलन (जयपुर किसान आन्दोलन)
{Shekhawati peasant movement (Jaipur peasant movement)}

✔️ शेखावाटी क्षेत्र में बिजौलिया किसान आन्दोलन के प्रमुख नेता व पत्रकार रामनारायण चौधरी ने राजनेतिक जनजागृति का कार्य किया
✔️ सन् 1921 में चिड़ावा सेवा समिति की स्थापना हुई । चिड़ावा सेवा समिति द्वारा सरकारी दमन व अत्याचार के विरोध में यहां किसान आन्दोलन प्रारम्भ किया गया ।
✔️ राम नारायण चौधरी ने तरूण राजस्थान नामक समाचारपत्र के माध्यम से यहां के किसानों में आन्दोलन हेतु प्रभावी वातावरण तैयार किया
नोट :- रामनारायण चौधरी ने लन्दन सें प्रकाशित “डेली हेराल्ड” नामक समाचार पत्र में शेखावाटी किसानों की समस्याओं के बारे में कई लेख सम्पादित किये ।
✔️ शेखवाटी में राजनैतिक जनजागृति लाने के उद्देश्य से 1925 में अखिल भारतीय जाट महासभा का अधिवेशन भरतपुर के तत्कालीन शासक महाराजा कृष्ण सिंह की अध्यक्षता में पुष्कर नामक स्थान पर किया गया।
✔️ सीकर के जाटों में राजनैतिक जागृति लाने के उद्देश्य से सन् 1934 में एक महायज्ञ का आयोजन रखा गया । इस यज्ञ का नाम ठाकुर देशराज के कहने पर “सीकर जाट प्रजापति महायज्ञ” रखा गया ।

कटराथल सभा (सीकर)
{Katrathal Sabha (Sikar)}
25 अप्रेल 1934

✔️ सिहोट के ठाकुर द्वारा बोसाणा तथा बेसाऊ गाँव की महिलाओं पर भारी अत्याचार किये गये । जिसके विरोध में ठाकुर हर लाल सिंह की पत्नी किशोरी देवी के नेतृत्व में 10,000 से अधिक जाट महिलाओं ने भाग लिया। इस महिला सम्मेलन में ठाकुर देशराज की पत्नी उत्तमा देवी ने भी भाग लिया ।

जयसिंहपुरा हत्याकांड
(Jaisinghpur Hatyakand)

✔️ 21 जून 1934 को ढूढ़लोद के ठाकुर ईश्वर सिंह द्वारा किसानों पर किये गये हमले में तीन लोग मारे गये ।
✔️ जाँच में ईश्वर सिंह दोषी पाया गया तथा डेढ़ साल का कारावास हुआ । यह जयपुर रियासत का पहला मामला था, जिस पर किसी अपराधी पर मुकदमा चलाया गया ।

खुण्डीग्राम की घटना (सीकर)
{Khundigram incident (Sikar)}

✔️ 25 मार्च 1935 को खुण्डीग्राम में किसानों की एक बारांत आई हुई थी, यहां के ठाकुरों ने दूल्हे के घोड़ी पर चढ़कर तोरण मारने का विरोध किया तथा रत्ना चौधरी की गला काट कर हत्या कर दी।
✔️ केप्टन के. बेव के नेतृत्व में पुलिस ने लाठीचार्ज किया ।

कूदणा हत्याकांड
(Koodna Hatyakand)

✔️ सीकर में प्रशासनिक नियन्त्रण स्थापित करने में असफल रहे के. बेव ने बोखलाकर कूदणा गाँव में भारी लूट-पाट की। इसमें तीन किसान मारे गये। इसके बाद कै. बेव ने गोठर व पलायथा गाँव को भी लूटा ।
✔️ अन्त में भारत सरकार के हस्तक्षेप के चलते जागीरदारों व किसानों के मध्य समझौता हो जाने से इस किसान आन्दोलन की सन् 1935 में समाप्ति हुई ।

बीकानेर किसान आन्दोलन
(Bikaner Farmer’s Movement)

✔️ बीकानेर रियासत में सिचाई पर किसानों से आबियाना कर वसुला जाता था, यहां के किसानों को पर्याप्त रूप से सिंचाई की सुविधा भी प्राप्त नही हो पा रही थी । अतः यहाँ के किसानों ने आन्दोलन शुरू किया । इस समय बीकानेर में गंगासिंह का शासन था ।
✔️ 26 अक्टूम्बर 1927 में गंगनहर का विधिवत शुभारम्भ हो चुका था ।
✔️ अप्रेल 1929 में जमीदार एसोसिएशन का गठन किया गया जिसके अध्यक्ष दरबारा सिंह थे ।

दूधवा-खारा आन्दोलन
(Dudhwa-Khara movement)

✔️ रियासतकाल में यह स्थान बीकानेर में आता था, वर्तमान में चुरू जिले में आता है । यहाँ के ठाकुर सुरजमल द्वारा जबरन वसूली के विरोध में कृषक नेता हनुमान सिंह महाराजा से मिलने गये तो हनुमान सिंह को बन्दी बना लिया गया । अतः हनुमान सिंह की गिरफ्तारी के विरोध में 300 स्त्री-पुरूषों ने वैध मेधाराम के नेतृत्व में आन्दोलन किया।
✔️ 7 अप्रेल 1946 को चुरू जिले की राजगढ़ तहसील के ललावा नामक स्थान पर प्रजा परिषद का गठन किया गया ।

✔️ इसका गठन कुम्भाराम आर्य की अध्यक्षता में किया गया । यह आन्दोलन तब तक चलता रहा जब तक हनुमान सिंह की रिहाई नही हुई ।
✔️ कागड़ा नामक स्थान का सम्बन्ध राज्य के दूधवा खारा कृषक आन्दोलन से है ।

अलवर-भरतपुर का मेव किसान आन्दोलन
(Meo Farmer’s Movement of Alwar-Bharatpur)

✔️ भरतपुर में 1932 में अंजुमन उल-खादी-इस्लाम नामक संस्था की स्थापना की गई । इस संस्था के द्वारा उर्दू का प्रचार-प्रसार मुस्लिमों के लिये पृथक शिक्षण संस्थाओं की स्थापना तथा मस्जिदों को सरकारी नियन्त्रण से मुक्त करने पर जोर दिया गया ।

✔️ सन् 1932 में मोहम्मद अली के नेतृत्व में यहां किसान आन्दोलन प्रारम्भ हुआ । आरम्भ में ही मेवों ने गुरिल्ला (छापामार) युद्ध पद्वति को अपनाया ।
✔️ सन् 1933 में जय सिंह को देश निकाला दे दिया ।
✔️ मेवों ने हिन्दओं के घरों को जलाना व उनकी सम्पत्ति को लटना आरम्भ कर दिया । यह किसान आन्दोलन परी तरह साम्प्रदायिक रंग में रंग चुका था । कुछ समय बाद यहां के किसानों की लगान माफ कर दी गई, परन्तु यह आन्दोलन पूरी तरह अपने उद्देश्य में असफल रहा ।

लोनी कर किसान आन्दोलन
(Loni Kar Peasant Movement)

✔️ सन् 1896 में जैसलमेर के शासक बेरीसाल ने पीतल के बर्तनों पर कर लगा दिया, अतः किसानों ने बर्तन खरीदना बन्द कर दिया । उसका सीधा-सीधा प्रभाव माहेश्वरी समाज के उपर पड़ा । अतः उन्होने किसान आन्दोलन प्रारम्भ किया ।
नोट :- यह किसान आन्दोलन राज्य का एकमात्र किसान आन्दोलन था जिसका नेतृत्व किसानों ने कर के व्यापारियों से किया था ।

लाणा प्रथा
(Lana system)

✔️ पीतल के बर्तनों में मिश्रि घोल कर बाटने की परम्परा को लाणा प्रथा कहा जाता था ।







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