राजस्थान में जनजाती आन्दोलन (Rajasthan Me Janjatee Aandolan) (Tribal movement in Rajasthan)

राजस्थान में जनजाती आन्दोलन

राजस्थान-में-जनजाती-आन्दोलन
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भील आन्दोलन (भोमट आन्दोलन)
Bheel movement (Bhomat movement)
Bheel Aandolan (Bhomat Aandolan)

✔️ मेवाड़ का दक्षिणी-पश्चिमी भाग भोमट के नाम से जाना जाता है, यहां भील तथा गरासिया जनजाती मुख्य रूप से निवास करती है। भील जाती द्वारा मेवाड़ की स्वतन्त्रता में दिये गये योगदान के कारण ही मेवाड़ के राजचिन्ह में एक राजपूत युवक के साथ धनुधारी भील युवक का चित्र भी अंकित है । सन् 1841 में अंग्रेजों द्वारा मेवाड़ भील कोर का गठन किया गया । सन् 1881 में अंग्रेजों द्वारा यहां सामाजिक तथा प्रशासनिक सुधार लाना चाहा परन्तु भीलों ने इसके विरोध में आन्दोलन प्रारम्भ किया। भील जिन्हे अपने सामाजिक कुरीतियों से विशेष लगाव था अतः इन्होने परिवर्तन को उचित नहीं समझा ।
✔️ भीलों में राजनैतिक तथा सामाजिक जनजागृति लाने का कार्य गोविन्द गिरी द्वारा किया गया ।
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गोविन्द गिरी एक परिचय:-

गोविन्द गिरी जिसे गोविन्द गुरू के नाम से भी जाना जाता है । इनका जन्म 1858 में डूंगरपुर जिले के बासिया ग्राम में एक बन्जारा परिवार में हुआ । गोविन्द गिरी ने भीलों में सामाजिक चैतना लाने के उद्देश्य से जो आन्दोलन चलाया उसे भगत आन्दोलन कहा जाता है । सन् 1883 मे गोविन्द गिरी ने सिरोही में सम्प सभा की स्थापना की जिसका प्रथम अधिवेशन 1903 में मानगढ़ पहाड़ी (बांसवाड़ा) पर बुलाया गया । यही से प्रतिवर्ष इसके वार्षिक अधिवेशन की शुरूआत हुई । इसके उपरान्त गोविन्द गिरी ने मानगढ़ पहाड़ी को अपनी कर्मस्थली बनाया ।
गोविन्द गिरी की रिहाई हुई । इन्होने अपना अंतिम समय गुजरात राज्य के कम्बोई नामक स्थान पर व्यतीत किया ।

भील आन्दोलन में मोती लाल तेजावत का योगदान :-

अधिक जानकारी के लिए क्लिक करे 👉 मोती लाल तेजावत

✔️ भीलों के मसीहा तथा बावजी नाम से विख्यात मोती लाल तेजावत का जन्म 8 जुलाई 1887 को मेवाड़ रियासत की फलासिया तहसील के किलीयारी गाँव में ओसवाल परिवार में हुआ था । ये झाड़ोल ठीकाने के कामदार थे । इन्होने

✔️ नवम्बर 1913 में मानगढ़ पहाड़ी पर इस सभा का वार्षिक अधिवेशन आयोजित किया गया जिसमें बारी के चलते तकरीबन 1500 लोग मारे गये । इस घटना को राजस्थान का एक ओर जलिया वाला बाग हत्याकांड कहा जाता है । कुछ समय बाद अंग्रेजी सरकार ने गोविन्द गिरी को गिरफ्तार कर मृत्यु दण्ड की सजा सुनाई गई किन्तु भीलों के भय से इस सजा को 20 वर्ष के कारावास में तब्दील कर दिया गया तथा अन्त में 10 वर्ष बाद सामाजिक जन जाग्रति लाने के उद्देश्य से इस पद से त्यागपत्र दे दिया । मोती लाल तेजावत ने भीलों में सुधार हेतु 21 सूत्रीय माँग पत्र तैयार किया जिसे “मेवाड़ की पुकार” कहा जाता है । सन् 1921 में चित्तौड़गढ़ जिले की राशमी तहसील के मातृकुण्डिया गाँव से एकी आन्दोलन की शुरूआत की। सन् 1922 में विजयनगर राज्य के निमाड़ा नामक स्थान पर एक सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें पुलिस ने गोलीबारी की यहां एक गोली मोती लाल तेजावत के पेर में लगी । सन् 1929 में महात्मा गाँधी के कहने पर मोती लाल तेजावत ने आत्मसमर्पण कर दिया ।
✔️ सन् 1942 में मोती लाल तेजावत ने गाँधी जी के भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लिया तथा गिरफ्तार कर लिये गये । 1945 में इनकी रिहाई हुई तथा 1963 में इनका निधन हो गया ।

मीणा आन्दोलन
(Meena movement)
(Meena Aandolan)

✔️ भारत सरकार द्वारा पारित 1924 में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत जयपुर रियासत के मीणाओं पर जरायम पेशा कानून तथा चौकीदार कानून लगाया गया । मीणा जाती को आदतन अपराधी घोषित कर दिया ।

✔️ जरायम पेशा कानून के अन्तर्गत मीणा जाती के परिवार के सदस्यों को नजदीकी थाने में हाजरी देनी पड़ती थी । अतः इस कानून से मीणा जाती में भारी असन्तोष व्याप्त था । जरायम पेशा कानून की समाप्ति को लेकर जयपुर रियासत के मीणाओं ने आन्दोलन प्रारम्भ किया। 1933 में मीणा क्षात्रिय महासभा का गठन हुआ । सन् 1944 को सीकर में नीम का थाना नामक स्थान पर जैनमुनि संत मगन सागर की अध्यक्षता में जयपुर रियासत के मीणाओं का एक सम्मलेन आयोजित किया गया। इस सम्मलेन में जयपुर राज्य मीणा सुधार समिति की स्थापना हुई जिसका

अध्यक्ष पण्डित बंशीधर शर्मा को बनाया गया । 31 दिसम्बर 1945 को A.I.S.P.C. का छटा अधिवेशन नेहरू जी की अध्यक्षता में राज्य के उदयपुर जिले में आयोजित किया गया । इस अधिवेशन में भी जयपुर रियासत के मीणाओं पर लागू जरायम पेशा कानून हटाने की मांग की गई । मसीहा ठक्कर बाप्पा ने भी तत्कालीन सरकार से जरायम पेशा कानून को हटाने की मांग की ।

✔️ सन् 1945 में जयपुर राज्य मीणा जाती सुधार समिति के संयुक्त मंत्री लक्ष्मीनारायण झरवाल के नेतृत्व में पुरे राज्य में व्यापक आन्दोलन चलाया गया ।

✔️ 3 जुलाई 1946 को एक कानून बनाकर जयपुर रियासत के मीणों को थाने में उपस्थिति देने से मुक्त कर दिया गया।

✔️ 28 अक्टूम्बर 1948 को बागावास नामक स्थान पर चौकीदार मीणों ने अपने को चौकीदारी मीणाओं ने अपने को चौकीदारी प्रथा से मुक्त घोषित कर दिया । 1952 में भारत सरकार द्वारा जरायम पेशा कानून को वापस ले लिया गया ।

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