राजस्थान की आन्तरिक प्रवाह प्रणाली वाली नदीयाँ (Rajasthan ki antarik pravah vali nadiya)

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राजस्थान की आन्तरिक प्रवाह प्रणाली वाली नदीयाँ
(Rivers with internal flow system of Rajasthan)

घग्घर नदी

घग्घर नदी प्राचीन सरस्वती नदी के पेटे में बहा करती थी। इस नदी का उद्गम हिमाचल प्रदेश के शिवलिक पर्वत श्रृंखला के कालका पहाड़ियों से होता है। कुल लम्बाई 465 किलोमीटर है ।

घग्घर नदी को पंजाब राज्य में चितांग नाम से जाना जात है ।

घग्घर नदी राजस्थान में बहने वाली आन्तरिक प्रवाह प्रणाली की सबसे लम्बी नदी है ।

यह एकमात्र अन्तर्राष्ट्रीय नदी एवं राज्य में उत्तर दिशा से प्रवेश करने वाली एकमात्र नदी है ।

नोट :- ऋगवेद के 10वें मण्डल के 136वें सुक्त के 5वें मन्त्र में इस नदी का उल्लेख है ।

घग्घर नदी के उद्गम स्थल पर कभी बहने तथा कभी समापन (विलुप्त) होने के कारण इसे नट नदी भी कहा जाता है । राजस्थान में यह नदी सर्वप्रथम हनुमानगढ़ जिले के तलवाड़ा नामक स्थान पर प्रवेश करती है, तथा यहां यह नदी तलवाड़ा झील का निर्माण करती है। इस झील की लम्बाई 7 किलोमीटर है तथा यह राजस्थान की सबसे नीची झील है ।

घग्घर नदी को सोतर नदी भी कहा जाता है । वर्षा ऋतु में पानी की अधिकता होने के कारण तथा हनुमानगढ़ जिले में इस नदी का प्रवाह क्षेत्र उथला होने के कारण बाढ़ की स्थिती उत्पन्न हो जाती है अतः इस कारण इस नदी को “राजस्थान का शोक’ कहा जाता है ।

घग्घर नदी हनुमानगढ़ जिले में भटनेर के मैदान में विलीन हो जाती है ।

नोट :- हनुमानगढ़ जिले में इस नदी का प्रवाह “नाड़ी” कहलाता है । कभी-कभी इस नदी का जल गंगानगर जिले के अनूपगढ़ तथा पकिस्तान के बहावलपुर जिले के फोर्ट अब्बास तक पहुच जाता है। पाकिस्तान में इस नदी का प्रवाह “हकरा” नाम से जाना जाता है। इस नदी का अंतिम स्थल पकिस्तान के बहावलपुर जिले का फोर्ट अब्बास है ।

नोट :- प्राचीन कालीबंगा एवं पीलीबंगा सभ्यता का विकास घग्घर नदी के तट पर हुआ है ।

नोट :- प्रत्यक्ष रूप से राजस्थान के दो जिले चुरू एवं बीकानेर में कोई नदी नही है, स्वतन्त्र रूप से श्री गंगानगर जिले में भी कोई नदी नही है । कभी-कभी घग्घर नदी का पानी अनूपगढ़ तक पहुच जाता है। अप्रत्यक्ष रूप से राजस्थान के तीन जिलों में कोई नदी नही है। चुरू, बीकानेर और श्री गंगानगर |

कांतली नदी

कांतली नदी का उद्गम सीकर जिले में स्थित खण्डेला की पहाड़ियों से होता है । कांतली नदी की कुल लम्बाई 100 किलोमीटर है।

पूर्णतः बहाव की दृष्टि से कांतली नदी राजस्थान में बहने वाली आन्तरिक प्रवाह प्रणाली वाली सबसे लम्बी नदी है ।

प्रसिद्ध गणेश्वर सभ्यता (सीकर) का विकास इसी नदी के तट पर हुआ है। गणेश्वर सभ्यता को ताम्र सभ्यताओं की

जननी कहा जाता है |

नोट :- इस नदी का प्रवाह क्षेत्र “तोरावाटी’ कहलाता है ।

वर्ष में केवल वर्षा ऋतु में बहने के कारण इसे मौसमी नदी भी कहा जाता है । कांतली नदी मिट्टी का कटाव करती हुई बहती है, अतः इसे स्थानीय भाषा में “काटली नदी” कहा जाता है ।

कांतली नदी झुन्झुनूं को दो समान भागों में विभाजित करती है, तथा चुरू की सीमा पर जाकर विलीन हो जाती है। नीम का थाना (सीकर) इसी नदी के किनारे स्थित है।

साबी नदी

साबी नदी का उद्गम जयपुर जिले में स्थित “सेवर की पहाडियो” से होता है ।

जोधपुरा (जयपुर) नामक उत्खनन स्थल जहाँ से “हाथीदांत के अवशेष” मिले है इसी नदी के तट पर स्थित है ।

साबी नदी आन्तरिक प्रवाह प्रणाली वाली नदीयों में ऐसी नदी है जो उत्तर की ओर बहती है ।

साबी नदी अलवर जिले की बानसुर तहसील में 25 किलोमीटर की सीमा निर्धारित करने के बाद हरियाणा राज्य के रेवाड़ी के समीप पटौदी नामक स्थान पर जाकर विलीन हो जाती है।

काकनी/काकनेय नदी

काकनी/काकनेय नदी का उदगम जैसलमेर जिले के कोठारी गाँव से होता है ।

काकनी/काकनेय नदी को मसुरड़ी नदी के नाम से भी जाना जाता है ।

काकनी/काकनेय नदी की कुल लम्बाई मात्र 17 किलोमीटर है । यह राजस्थान की सबसे छोटी आन्तरिक प्रवाह प्रणाली वाली नदी है।

काकनी/काकनेय नदी का समापन स्थल जैसलमेर जिले का बुझनी गाँव है जहाँ यह “बुझ झील’ का निर्माण करती है।

मन्था/मेंथा/मेढ़ा नदी

मन्था नदी का उद्गम जयपुर जिले में स्थित मानोहर थाना क्षेत्र की पहाडियों से होता है।

मन्था नदी उत्तर दिशा से सांभर झील में गिरती है ।

नोट :- नागौर जिले में स्थित प्रसिद्ध जैनियों का लूणवाँ तीर्थस्थल इसी नदी के तट पर स्थित है ।

रूपनगढ़ नदी

रूपनगढ़ नदी का उद्गम स्थल अजमेर जिले में स्थित नाग पहाड़ के समीप से होता है ।

रूपनगढ़ नदी के तट पर अजमेर जिले में निम्बाक्र सम्प्रदाय की मुख्य पीठ सलेमाबाद में स्थित है

रूपारेल नदी

रूपारेल नदी का उद्गम अलवर जिले में उदयभान की पहाड़ियों से होता है।

रूपारेल नदी को लसावरी तथा वराह नदी के नाम से भी जाना जाता है ।

रूपारेल नदी भरतपुर में गोपालगढ़ कस्बे के समीप प्रवेश करती है।

रूपारेल नदी भरतपुर जिले में कुशलपूरा नामक स्थान पर जाकर विलिन हो जाती है ।

नोट :- भरतपुर की लाइफ लाइन “मोती झील’ को कहा जाता है ।

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