तेजाजी,देवनारायण जी, वीर कल्लाजी, मल्लीनाथ जी, हडबुजी(Rajasthan Ke Lok devta Tejaji, Devnarayan Ji, Veer Kallaji, Mallinath Ji, Hadbuji)

राजस्थान के लोक देवता
Rajasthan ke Lok Devta

Tejaji-Veer-kallaji-DevnarayanJi
Tejaji-Veer-kallaji-DevnarayanJi

 तेजाजी 
(Tejaji)

❇️ इनका जन्म सन् 1074 को नागौर जिले की परबतसर तहसील के खरनाल में हुआ था । पिता का नाम ताहड़ जी (नागवंशीय जाट) व माता का नाम राज कुंवर (रामकुंवरी) था । पत्नी का नाम पेमल दे था । (ये अजमेर जिले के पनेर निवासी रायमल जी झांझर की पुत्री थी। 

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❇️ तेजाजी को गायों के मुक्ति दाता तथा सांपों के देवता के रूप में पूजा जाता है । इन्होने लाछा गुजरी (हीरा गुजरी) की गायों को पनेर के मीणाओं से छुड़ाया था । 
❇️ तेजाजी के पूजा स्थल को थान कहा जाता है । तेजाजी के भोपे को घोडला कहा जाता है । 
❇️ तेजाजी के प्रतीक के रूप में तलवार धारी घुडसवार योद्धा तथा सर्प उकेरा हुआ मूर्ति तथा जीभ को सर्पदंश करते हुए दिखाया जाता है । तेजाजी को कृषि कार्यो का उपकारक देवता तथा काला और बाला का देवता कहा जाता है। तेजाजी की एक घोडी थी जिसका नाम लीलण था । जाटों में तेजाजी की सर्वाधिक मान्यता है । 
नोट :- रामराज नाहटा ने तेजाजी के जीवन पर राजस्थानी भाषा में वीर तेजाजी नामक फिल्म बनाई है । 
तेजाजी के प्रमुख मन्दिर 
❇️ सेन्दरिया :- ब्यावर अजमेर में स्थित है । 
❇️ ब्यावर में ।
❇️ भावता – अजमेर जिले में स्थित है । इस स्थान पर सुरसरा से जोत मंगवाकर यहां तेजाजी की संगमरमर की मूर्ति स्थापित की गई है । 
❇️ सुरसरा :- इस स्थान पर तेजाजी को नाग ने डसा था । जबकि उनकी मृत्यु सेन्दिरया (अजमेर) नामक स्थान पर हुई थी ।


देवनारायण जी 
(Devnarayan Ji)

❇️ जन्म माघ शुक्ल 6 सम्वत् 1243 को भीलवाड़ा जिले के आसीन्द कस्बे के समीप मालसेरी नामक गाँव में हुआ।

❇️ देवनारायण जी के बचपन का नाम उदय सिंह था । 

❇️ पिता का नाम सवाईभोज (बगड़ावत या नागवंशीय गुर्जर) था, तथा माता का नाम सेडू या सोढ़ी (ये देवास मध्यप्रदेश की निवासी) था। इनकी शिक्षा देवास में हुई ।

❇️ इनका विवाह धार (मध्यप्रदेश) के शासक जयसिंह की पुत्री पीपल दे के साथ हुआ । 

❇️ इनके भाई का नाम महेन्दू था । 

❇️ गुर्जर जाती इन्हे विष्णु का अवतार मानती है । इनकी घोड़ी का नाम लीला था ।

❇️ देवनारायण की फड़ गुर्जर भोपों द्वारा जन्तर वाद्ययंत्र के साथ करते है । इनकी फड़ जर्मनी के संग्रहालय में सुशोभित है। 

❇️ देवनारायण जी ने गर्जर जाती को भिनाय के राणा को मारकर कष्टों से छुटकारा दिलाया था । 

❇️ गुर्जर जाती देवनारायण जी को अपना लोकदेवता मानती है । 

❇️ देवनारायण जी की मृत्यु अजमेर जिले के ब्यावर कस्बे के देवमाली नामक स्थान पर हुई । 

नोट :- सन् 1992 में देवनारायण की फड़ पर डाक टिकट जारी किया गया । 

प्रमुख मन्दिर 

❇️ देवमाली (अजमेर) 

❇️ देवधाम जोधपूरिया (टोंक) (बनास, मांशी और बांड़ी के त्रिवेणी संगम पर) 

❇️ सवाई भोज मन्दिर – आसीन्द (भीलवाड़ा) 

सर्वाधिक लोकप्रिय फड़ :- पाबूजी । (सर्वाधिक पूरानी फड़) 

सर्वाधिक लम्बी फड़ :- देवनारायण जी । 

बिना वाद्ययंत्र की सहायता से वाची जाने वाली फड़ :- रामदला-कृष्णदला की फड़

वीर कल्लाजी 
(Veer Kallaji)

❇️ इनका जन्म 1601 में मेड़ता में हुआ । इनके पिता का नाम आस सिंह राठौड़ व इनकी बुआ का नाम मीरा बाई था ।

❇️ माना जाता है कि इनकी पाँच वर्ष की उम्र में भैरव से साक्षात्कार हुआ । इन्हे सिद्धियां तथा जड़ी-बूटियों का ज्ञान प्राप्त था । 

❇️ कल्ला जी को चार हाथों वाले तथा दो सिर वाले लोकदेवता के रूप में माना जाता है ।

❇️ जब 24 फरवरी 1568 को चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर अकबर के आक्रमण के दौरान कल्लाजी ने जयमल को अपने कंधों पर बिठाकर युद्ध किया । अकबर ने इन्हे चार हाथों वाला देवता कहा । 
❇️ कल्लाजी को शेषनाग के अवतार के रूप में पूजा जाता है । 
❇️ मेवाड़ तथा बांगड़ क्षेत्र के साथ-साथ गुजरात, मध्यप्रदेश तथा मालवा क्षेत्र में भी इनकी पूजा की जाती है । 
❇️ इनका मुख्य मन्दिर चित्तौड़गढ़ दुर्ग में भैरव पोल के पास स्थित है । 
❇️ डूंगरपुर के सामलिया नामक स्थान पर इनकी काले पत्थर की प्रतिमा स्थित है । 
❇️ वीर कल्लाजी को कल्लाजी केहर, कमगज, योगी, बाल ब्रह्मचारी, कमधण तथा कल्याण के नाम से भी जाना जाता है।

❇️ प्रतिवर्ष श्रावण शुक्ल अष्टमी को इनका मेला चित्तौड़गढ़ में आयोजित होता है । इनकी मुख्य पीठ रनेला में है ।


मल्लीनाथ जी 
(Mallinath Ji)

❇️ इनका जन्म 1358 में जोधपुर (मारवाड़) में हुआ इनके पिता का नाम राव सलखा था व माता का नाम जीणी दे था। कान्हड़दे इनके ताऊ थे । इन्होने 1378 मे फिरोजशाह तुगलक तथा मालवा के सुबेदार निजामुद्दीन की सम्मिलित सेनाओं को पराजित किया तथा लोगों की सेना से रक्षा की । जिसके लिये मारवाड़ में निम्न कहावत प्रसिद्ध है – “तेरह तुंगा भांगिया, मोल सलखाणी’ । 

❇️ मारवाड़ क्षेत्र में इन्हे त्राता (रक्षक) के रूप में पूजा जाता है । 
❇️ मल्लीनाथ जी ने अपनी रानी रूपादे की प्रेरणा से 1389 ईस्वी में उगमसी भाटी से योगसाधना की दीक्षा ग्रहण की थी। 
❇️ मल्लीनाथ जी की समाधि बाडमेर जिले के तिलवाड़ा नामक स्थान पर लूनी नदी के तट पर स्थित है । 
❇️ मल्लीनाथ जी सिद्ध पुरूष शूरवीर तथा चमत्कारिक योद्धा के रूप में पूजे जाते थे ।

हडबुजी
(Hadbuji) 

❇️ हड़बुजी का जन्म नागौर जिले के भूण्डेल नामक स्थान पर सांखला के यहां हुआ । 
❇️ हडबुजी परम शूरवीर, योगी, वचनसिद्ध, शकुन शास्त्र के ज्ञाता एवं समाज सुधारक थे । 
❇️ हडबुजी ने रामदेवजी की प्रेरणा पर शस्त्र त्याग कर योगी बाली नाथ जी से शिक्षा ग्रहण की थी । 
❇️ जोधपुर जिले में फलौदी के पास वेंगटी नामक स्थान पर हड़बुजी का मन्दिर स्थित है । इस मन्दिर का निर्माण 1721 में जोधपुर के तत्कालीन शासक अजीत सिंह द्वारा करवाया गया । 
❇️ हड़बुजी के पूजारी सांखला राजपूत होते है । हड़बुजी का वाहन सियार होता है । 
❇️ हडबुजी बाबा रामदेव जी के मौसेरे भाई थे । मारवाड़ के पंचपीरों में से हडबुजी भी एक थे ।

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