रामदेवजी,पाबूजी, गोगाजी (Rajasthan ke Lok Devta Ramdevji, Gogaji, Pabooji)

 राजस्थान के लोकदेवता
रामदेवजी
(Ramdevji)
एक परिचय :- जन्म विक्रमी संवत् 1465 में भाद्रपद शुक्ल द्वितीया को बाडमेर जिले के उड्डुक कशमीर या उड़कासमेर में हुआ । पिता का नाम अजमाल जी (तंवर वंशी) थे । माता का नाम मेणादे था । पत्नी का नाम नेतल दे (यह अमरकोट के दले सिंह की पुत्री थी) था । भाई का नाम वीरमदेव था । इनको बलराम का अवतार माना जाता है । बहिन का नाम सुगना बाई था । (सुगना के पति पूगलगढ़ के विजय सिंह थे, जो कि बाद में रामदेव जी के अनुयायी बन गये)। धर्म बहिन मेघवाल जाती की डाली बाई थी । रामदेवजी के गुरू का नाम बालीनाथ था ।

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प्रमुख योगदान :- समाज में व्याप्त छूआछूत तथा ऊँच-नीच जैसी कुरीतियों को समाप्त करना ।
प्रमुख मन्दिर
रामदेवरा :- जैसलमेर जिले में स्थित इस मन्दिर डाली बाई तथा रामदेवजी की समाधि स्थित है । यहाँ प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल द्वितीया को रामदेवजी के जन्म के अवसर पर विशाल मेला आयोजित होता है । यह राजस्थान का सबसे बड़ा साम्प्रदायिक सद्भाव का मेला है। इस मेले का मुख्य आकर्षण कामड़ जाती की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला तेरहताली नृत्य है ।
छोटा रामदेवरा मन्दिर :- रामदेवजी का यह मन्दिर गजरात राज्य में स्थित है ।
सुरताखेड़ा :- रामदेवजी का यह मन्दिर चित्तौड़गढ़ जिले के सुरताखेड़ा नामक स्थान पर स्थित है।
बराठिया मन्दिर :- यह मन्दिर अजमेर जिले के बर नामक स्थान पर स्थित है ।
महत्वपूर्ण तथ्य :-
रामदेवजी ने अछूतोद्धार हेतु कामडिया मत प्रारम्भ किया। इसमें स्वर्ण तथा निम्न जातीयाँ अनुयायी है ।
रामदेवजी को हिन्दू कृष्ण के अवतार के रूप में, तथा मुसलमान रामसा पीर के रूप में पूजते है।
सामाजिक सुधार के लिये जम्मा जागरण के माध्यम से रामदेवजी ने लोगों को समझाना तथा उनके साथ खाना-पीना, उठना-बैठना प्रारम्भ किया । जम्मा जागरण के द्वारा रामदेवजी ने अछूत कही जाने वाली जाती के लोगों को गले लगाया, इस अभियान से जुड़े लोग उन्हे बाबा रामदेवजी कहने लगे ।
रामदेवजी ने मुसलमान बने हिन्दुओं को पूनः हिन्दू बनाने के लिये शुद्धीकरण आन्दोलन चलाया था।
बाल्यावस्था में रामदेवजी ने आतंक फैलाने वाले तान्त्रिक भैरव को सातलमेर में मारकर लोगों का भय समाप्त किया ।
रामदेवजी को पीरों का पीर भी कहा जाता है | इन्होने मक्का के पाँच मुसलमान पीरों को अपना चमत्कार बताया तथा उनके बर्तनों को मक्का से यहाँ लाकर बताने पर पाँचों पीर रामदेवजी के चरणों में पड़ गये, तथा रामदेवजी को पीरों का पीर कहा ।
फड़ का चित्रण चौथमल चितैरे ने किया ।
रामदेवजी के प्रतीक चिन्ह के रूप में चबूतरे पर ताख में पगल्या (चरण चिन्ह)
रामदेवजी के भक्तों को रिखिया कहा जाता है, तथा मन्दिर के उपर पताका को नेजा कहा जाता है, यह पंचरंगी होती है । इनके मन्दिर को देवरा कहा जाता है ।

Lord of lord of Rajasthan-

पाबूजी
(Pabooji)

जन्म विक्रमी संवत् 1313 में जोधपुर जिले में फलौदी के पास कोलू नामक गाँव में हुआ ।

पिता का नाम धान्धल जी राठौड़ था, माता का नाम कमला दे था ।

इन्हे ऊँटों के देवता के रूप में पूजा जाता है ।

पाबूजी को लक्ष्मण का अवतार भी मानते है ।

पाबूजी मारवाड़ के राठौड़ वंश के आदि पुरूष राव सिंहा के वंशज थे । इन्हे हड़फाड़ पाबूजी के नाम से भी जाना जाता है ।

पाबूजी ने गौरक्षा के लिये अपने प्राण देकर अपनी प्रतिज्ञा को पूरा किया।

पाबूजी वर्तमान में राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात तथा महाराष्ट्र में भी लोकदेवता के रूप में पूजे जाते है ।

24 वर्ष की आयु में देवल चारणी की गायों को अपने बहनोई जिन्दराव खींची से छुड़ाते हुए मृत्यु को प्राप्त हुए ।

केसर कालमी देवल चारणी की घोड़ी थी, जिन राव खींची ने भी देवल चारणी की घोड़ी केसर कालमी को प्राप्त करने का प्रयास किया था ।

ये राजस्थान के एकमात्र ऐसे लोकदेवता है जो गायों की रक्षा हेतु शादी के फेरों को बीच में छोड़कर चले गये थे ।

पाबूजी को ऊटों के देवता तथा प्लेग के रक्षक के रूप में भी पूजा जाता है ।

पाबूजी की फड़ सर्वाधिक लोकप्रिय फड़ है । भीलवाड़ में पुर गाँव के निवासी धुलची नामक चितेरे ने सर्वप्रथम पाबूजी की फड़ का निर्माण किया। पाबूजी की फड़ गाथा की रचना कार देवल चारणी को माना जाता है ।

पाबूजी की फड़ को रेबारी जाती के लोग गाकर सुनाते है ।

पाबूजी के चार सरदार देमा, चान्दा, हरमल रायका तथा सलजी सोलंकी थे ।

रामदेवजी, पाबूजी, गोगाजी, हडबूजी, मेहाजी को राजस्थान में पंचपीर के नाम से पूजा जाता है

Lord of lord of Rajasthan-

गोगाजी
(Gogaji)

जन्म विक्रमी संवत् 1003 में चुरू जिले के ददरेवा नामक स्थान पर हुआ।

पिता का नाम चौहान वंशीय जावर सिंह व माता का नाम बाछल था (गोरखनाथ के आशीर्वाद से गोगाजी का जन्म हुआ था)

गोगाजी का विवाह कोलू के शासक की पुत्री तथा पाबूजी की भतीजी केलम दे के साथ हुआ ।

गोगाजी को सांपों के देवता के रूप में पूजा जाता है ।

गोगाजी को जाहर पीर (जीवीत पीर) भी कहा जाता है ।

मुसलमान इनकी गोगा पीर के रूप में तथा हिन्दू इनकी नागराज के रूप में पूजा करते है ।

गोगाजी अफगानिस्तान के शाह द्वारा गोधन को चुराने पर उसे हरा कर गौरक्षा की तथा उन्हें वापस ले आये। इसलिये इन्हे गौरक्षक भी कहा जाता है । दिल्ली के बादशाह महमूद गजनवी के साथ युद्ध मे अपनी चपलता के

साथ उसे हर समय दिखाई देते रहे। इसी कारण महमूद ने इन्हे जाहर पीर कहा ।

गोगाजी के पूजास्थल को मेड़ी कहा जाता है । यहां उनका जन्म हुआ था।

जबकि मृत्यु स्थान को गोगामेड़ी कहा जाता है । गोगामेड़ी हनुमानगढ़ में स्थित है । गोगा मेड़ी को धड़मेड़ी भी कहा जाता है । गोगामेड़ी के प्रवेश द्वार पर बिस्मिल्ला लिखा हुआ है जबकि मुख्य मन्दिर पर ओम लिखा हुआ है । मेड़ी का आकार मकबरा नुमा है । जिसका निर्माण गंगासिंह द्वारा करवाया गया था ।

गोगाजी का प्रतीक के रूप में अश्वारोही हाथ में भाला लिये हुए होता है।

ददरेवा में प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण नवमी से शुक्ल नवमी तक गोगाजी का मेला लगता है । माना जाता है कि ददरेवा तालाब की मिट्टी का लेप करने पर साँप का जहर उतर जाता है ।

किसान वर्षा के बाद हल जोतने से पहले हल व हाली को राखी बांधते है जिसे “गोगा राखड़ी” कहा जाता है ।

गोगाजी की ओल्डी (झोपड़ी) सांचोर नामक स्थान पर स्थित है ।

गोगाजी का थान खेजड़ी वृक्ष के नीचे होता है । कायमखानी मुसलमान इन्हे अपना पूर्वज मानते है।

गोगाजी के बारे में कहा जाता है कि गाँव-गाँव खेजड़ी, गाँव-गाँव गोगो

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