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राजस्थान का मैदानी भाग (Plains of Rajasthan) - gk website
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राजस्थान का मैदानी भाग (Plains of Rajasthan)

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राजस्थान

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राजस्थान-का-भौतिक-विभाजन

राजस्थान को दो भागो में विभाजित किया गया है –
1. राजस्थान का मैदानी भाग- (अरावली प्रदेश,चम्बल बेसिन,मरूस्थलीय प्रदेश,जैसलमेर मरूस्थलीय,बाडमेर मरूस्थलीय,बीकानेर, चुरू,लुनी बेसिन,चम्बल बेसिन,बागड़ प्रदेश,घग्घर का मैदान,शेखावाटी क्षेत्र,नागौर प्रदेश)
2.राजस्थान का पठारी भाग- (उत्तरी अरावली,मध्य अरावली,दक्षिण अरावली,निम्न व मध्य चम्बल बेसिन)

राजस्थान का मैदानी भाग :-

मरूस्थल में पाई जाने वाली प्रमुख संरचनाए तथा शब्दावली-

1. लाठी सीरीज :- पाकिस्तान देश के सहारे (पास में) पोकरण से मोहनगढ़ तक का क्षेत्र लाठी सीरिज के नाम से जाना जाता है ।
2007 में काजरी के वैज्ञानिकों द्वारा यह स्पष्ट किया गया कि इस क्षेत्र में 80 मीटर लम्बी तथा 60 मीटर चौड़ी एक भूगर्भिक जल पट्टी का विस्तार है।
इस क्षेत्र में धामण, करड़, अजाण, लीलोण, सेवण घास मुख्य रूप से पायी जाती है।
नोट :- सेवण घास का कटा हुआ रूप लीलण कहलाता है|
राज्य का राज्य पक्षी गोड़ावण अपने अण्डे सेवण घास पर देता है। इसी कारण सेवण घास को गोडावण पक्षी की प्रजनन सम्पति कहा जाता है।
इसी क्षेत्र में जैसलमेर जिले की सम तहसील में चन्दन गाँव में एक मीठे पानी का जल स्त्रोत (कुआ) है। जिससे प्रति घन्टे में लगभग 2.30 लाख लीटर मीठा पानी निकलता है। इसे चन्दन नलकूप या “थार का घड़ा” भी कहा जाता है। इस कुए का वास्तविक नाम “चौहान” है।
2. पीवणा :- इस क्षेत्र में पाये जानो वाला जहरीला सर्प जो डंक नही मारता बल्कि रात्रि में सोते हुए व्यक्ति को श्वांस के द्वारा जहर देकर मारता है।

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Peevana-snake-Rajasthan

3. मावठ/महावठ/शीतकालीन वर्षा :- पश्चिमी विक्षोभों तथा भूमध्य सागरीय चक्रवातों से शीतकाल में होने वाली वर्षा जो रबी की फसल के लिये उपयोगी होती है मावठ कहलाती है।
4. नेहड़ :- लगभग 100 वर्ष पूर्व राज्य के जालौर तथा बाडमेर जिले में समुद्र का जल आकर ठहरता था। अतः जालौर व बाडमेर जिले का क्षेत्र नेहड़ कहलाता था । नेहड़ का शाब्दिक अर्थ होता है ” समुद्र का जल” | मरूस्थलीय क्षेत्र में जल संचय के तरीके-
1.आगोर :- प्राचीन काल में मरूस्थलीय क्षेत्र में वर्षा के जल का संचय करने के लिये टांके बनाये जाते थे, जिन्हे आगोर कहा जाता था

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Aagora-आगोर-Rajasthan

2. खड़ीन :- कृषि के लिये वर्षा के जल का संचय करना ।

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खड़ीन-Khadin-Rajasthan

3. नाड़ी :- मानव के दैनिक आवश्यकताओं तथा पशुपालन के लिये वर्षा का जल संचय करना ।
4. टोबा :- नाड़ी को कृत्रिम रूप से ओर अधिक गहरा करना टोबा कहलाता है।
5. बेरी :- खड़ीन तथा नाड़ी के पास जो जल का रिसाव होता था उस जल को पूनः उपयोग में लाने हेतु इनके आस-पास छोटे-छोटे कुए बना दिये जाते थे जिन्हे बेरी कहा जाता है।
6. प्लाया :- सामान्य भाषा में गहरे पानी की बड़ी झीलों को प्लाया कहा जाता है । वर्षाकाल में वर्षा का जल मरूस्थल के बड़े-बड़े गर्तों में आने के बाद वहां की मिट्टी से लवणता को प्राप्त कर खारा हो जाता है । ऐसे बडे गर्तों को प्लाया कहा जाता है। सर्वाधिक प्लाया झीलें जैसलमेर में है ।
7. रन/टाट/ढ़ाढ़ :- मरूस्थल में रेत के छोटे-छोटे गड्डे जिनमें वर्षा का जल आकर ठहरता है तथा मिट्टी से लवणता को प्राप्त कर खारा हो जाता है । ऐसे छोटे-छोटे गड्डे रन/टाट/ ढ़ाढ़ कहे जाते है ।
8. तिल्ली/पोखर :- छोटे-छोटे ऐसे गड्डे जिनमें वर्षा का मीठा जल आकर ठहरता है तिल्ली या पोखर कहलाते है।

बनावट/संरचना के आधार पर मरूस्थल के प्रकार-
शुष्क मरूस्थल [बालूका स्तुप युक्त क्षेत्र, बालूका स्तुप मुक्त क्षेत्र ]
अर्द्ध शुष्क मरूस्थल [घग्घर का मैदान,शेखावाटी का अन्तःप्रवाह,लूनी बेसिन (गोडवाना प्रदेश)]
शुष्क मरूस्थल –
उत्तर पश्चिम मरूस्थल का वह क्षेत्र जहां वनस्पति नगण्य या नाममात्र की पायी जाती है, तथा वर्षा बहुत ही कम मात्रा में होती है। इस क्षेत्र में वर्षा 0 से 25 से.मी. तक होती है ।
इस क्षेत्र में कांटेदार झाड़ियां बहुतायात में पायी जाती है।
1.बालूका स्तूप युक्त प्रदेश :- उत्तर पश्चिम मरूस्थल का वह क्षेत्र जहां धोरे/टीले या टीबों का निर्माण होता है। बालुका स्तूप युक्त प्रदेश है।

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बालूका स्तूप युक्त प्रदेश के अन्तर्गत राज्य की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर स्थित चारों जिले गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर, बाडमेर तथा चुरू व पश्चिमी नागौर एवं जोधपुर जिला शामिल है।
2. बालूका स्तूप मुक्त प्रदेश :- उत्तर पश्चिम मरूस्थल का वह क्षेत्र जहां धोरों का निर्माण नही होता है अर्थात वह क्षेत्र जो चट्टानों से अच्छादित है बालुका स्तूप मुक्त प्रदेश है।
इस क्षेत्र में जुरासिक काल के जीवाश्म के अवशेष पाये जाते है इसका उदाहरण जैसलमेर जिले में स्थित आंकल गाँव में “वुड फॉसिल पार्क’ है।

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नोट :- राज्य का सबसे न्यूनतम वर्षा वाला स्थान सम गाँव जैसलमेर जिले में स्थित है । तथा यही गाँव (सम गाँव) राज्य का न्युनतम वनस्पति या वनस्पति रहित क्षेत्र है।
इस क्षेत्र में जैसलमेर जिले की पोकरण तहसील, बाडमेर जिले की छप्पन की पहाडियां, फलोदी तहसील का कुछ क्षेत्र इस प्रदेश के अन्तर्गत आता है।

अर्द्धशुष्क मरूस्थल-
शुष्क मरूस्थल तथा अरावली के मध्य का क्षेत्र अर्द्धशुष्क मरूस्थल के नाम से जाना जाता है।
यह प्रदेश शुष्क मरूस्थल से 25 से.मी. वर्षा रेखा द्वारा तथा अरावली प्रदेश में 50 से.मी. वर्षा द्वारा विभाजित होता है।

इस प्रदेश के अन्तर्गत पूर्वी चुरू, पश्चिमी झुन्झुन, सीकर तथा जोधपुर, नागौर, पाली व अजमेर का अधिकांश भाग तथा बाडमेर का दक्षिण-पूर्वी भाग शामिल है।

धरातल के आधार पर हम अर्द्धशुष्क मरूस्थल को 4 भागों में बांट सकते है –

1. घग्घर का मैदान
2. शेखावाटी का अन्तःप्रवाह क्षेत्र
3. नागौर का पठार
4. लूनी बेसिन गोडवाना प्रदेश

1. घग्घर का मैदान :-. राज्य के श्री गंगानगर तथा हनुमानगढ़ जिले में घग्घर नदी का प्रवाह क्षेत्र को घग्घर का मैदान के नाम से जाना जाता है।

. घग्घर नदी का पाट स्थानीय भाषा में “नाड़ी” तथा घग्घर नदी का मैदान स्थानीय भाषा में “बग्गी’ कहलाता है।
घग्घर नदी के इस प्रवाह क्षेत्र में भूरी मटीयार मिट्टी पायी जाती है।
नोट:- हनुमानगढ़, गंगानगर के इस क्षेत्र में पत्थर की परत है जिसके कारण पानी जमीन के पेटे तक नही बैठ पाता है तथा उपर ही बचा रहता है तथा कुछ समय बाद दलदल में परिवर्तित हो जाता है। इस दलदल के परिणामस्वरूप वातावरण में होने वाले समस्त परिवर्तनों को सेम समस्या कहा जाता है।
नोट:- हनुमानगढ़ जिले का बडोपोल गाँव सेम समस्या के लिये प्रदेश में जाना जाता है।
2. शेखावाटी का अन्तःप्रवाह क्षेत्र :-
माना जाता है कि शेखावाटी को राव शेखा द्वारा बसाया गया था। अतः इस क्षेत्र को शेखावाटी नाम से जाना जाता है। इसके अन्तर्गत राज्य के सीकर, चुरू व झुन्झुनूं जिले आते है। इस क्षेत्र में चुने की विशाल परत पायी जाती है। इसी कारण यहां गर्मियों में अधिकांश गर्मी तथा सर्दियों में अधिकांश सर्दी का अनुभव होता है।
नोट :- इसी परत के कारण राज्य का सबसे ठण्डा एवं गर्म दोनों चुरू ही है ।
नोट :- राज्य का सर्वाधिक वार्षिक तापान्तर वाला जिला चुरू एवं न्यूनतम तापान्तर वाला जिला डूंगरपुर है।
नोट :- शेखावाटी क्षेत्र में कुओं को स्थानीय भाषा में जोहड़ या नाड़ा कहा जाता है, तथा कुओं को अधिक गहरा करने को चोभी कहते है।
नोट :- ढुढ़ाड क्षेत्र में कुओं को बेरी कहा जाता है।
3. नागौर का पठार :-
नागौर क्षेत्र की भूमि में सतही मिट्टी पर नमक की मात्रा पाई जाती है। अतः इस क्षेत्र में पाई जाने वाली झीलें अधिकांशतः खारे पानी की झीलें है।

इस क्षेत्र में भूमिगत जल में फ्लोराइड की मात्रा पाई जाती है, जिससे फ्लोरोसिस नामक रोग हो जाता है। इस रोग के कारण दांत पीले पड़ जातें है, तथा हड्डियां गलने लगती है । इसे कुबड़ समस्या भी कहा जाता है। अतः फ्लोराईड़ युक्त जल पट्टी का विस्तार “कुबड़ पट्टी” कहलाता है। राज्य के नागौर तथा अजमेर जिले में “कुबड़ पट्टी” का विस्तार पाया जाता है। राज्य में सरिस्का के अतिरिक्त नागौर का पठार ऐसा क्षेत्र है जहां हरे कबूतर पाये जाते है। हरे कबूतर मुख्य रूप से उत्तरप्रदेश राज्य में पाये जाते है।
4. लूणी बेसिन/गोडवाणा प्रदेश :-
लूनी नदी व इसकी सहायक नदीयों का प्रवाह क्षेत्र मुख्य रूप से पाली, जोधपुर, नागौर, बाडमेर, जालौर, व अजमेर जिले का क्षेत्र जहाँ लूनी नदी प्रवाहित होती है, लूनी बेसिन के नाम से जाना जाता है। .
इस क्षेत्र में बाडमेर जिले में छप्पन की पहाडियाँ स्थित है जिनका विस्तार जालौर जिले में भी है। इन पहाड़ियों में ग्रेनाइट पाया जाता है। इस कारण जालौर जिले को ग्रेनाईट सिटी भी कहा जाता है।
छप्पन का पर्वत उदयपुर जिले में स्थित है जबकि छप्पन का मैदान बांसवाड़ा जिले में स्थित है।
बाडमेर जिले में स्थित छप्पन की पहाड़ियों में जैनियों का प्रमुख तीर्थस्थल नाकोडाजी स्थित है।
बाडमेर में हल्देश्वर पहाडियों पर स्थित “पिपलुद” कस्बे को मारवाड़ का माउन्ट आबू‘ तथा राजस्थान का लघु माउन्ट आबू कहा जाता है।
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