Mughal-Marwar Relations, Mughal-Bikaner Relations

-: इतिहास कला एवं संस्कृति :-

मुगल – मारवाड़,मुगल - बीकानेर संबंध
मुगल – मारवाड़,मुगल – बीकानेर संबंध

मुगल – मारवाड़ संबंध

वीर दुर्गादास राठौड :-

➥ दुर्गादास राठौड़ का जन्म मारवाड़ रियासत के सालवा गाँव में 1638 में हुआ।

➥ कर्नल जेम्स टॉड ने इन्हें राठौड़ो का यूलीसैस कहा।

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आसकरण के पुत्र दुर्गादास राठौड़ जसवन्त सिंह के दरबारी थे।

➥ इन्होंने जसवन्त सिंह के पुत्र अजीत सिंह की रक्षा के लिए औरंगजेब से आजीवन संघर्ष किया।

➥ इन्होंने मुगलों के विरूद्ध राठौड़ सिसोदिया संघ का निर्माण किया।

➥ अजीत सिंह द्वारा देश निकाला देने पर मेवाड़ चले गए।

दुर्गादास राठौड़ मेवाड़ के महाराणा अमर सिंह द्वितीय व संग्राम सिंह। द्वितीय की शरण में रहा।

➥ दुर्गादास राठौड़ की मृत्यु उज्जैन में 1718 में हुई।

➥ दुर्गादास राठौड़ की छतरी शिप्रा नदी के तट पर उज्जैन के रामपुरा गाँव में है।

महाराजा अजीत सिंह (1679-1724) :-

➥ जसवंत सिंह की मृत्यु के समय उसकी रानी गर्भवती थी जिसने लाहौर में अजीत सिंह को जन्म दिया।

➥ औरंगजेब रानी व अजित सिंह को बन्दी बनाकर दिल्ली लाकर नजरबन्द कर दिया।

➥ औरंगजेब ने रानी के सामने शर्त रखी की अजित सिंह का इस्लाम धर्म स्वीकार कराया जाये वरना जोधपुर को खालसा घाषित कर दिया जायेगा।

➥ अजित सिंह को इस्लाम स्वीकार नहीं कराने पर जोधपुर को खालसा घोषित कर दिया।

➥ दुर्गादास अजित सिंह को मारवाड़ का शाषक बनाना चाहता था।

➥ दुर्गादास ने बाघेली गोरा धाय तथा मुकुंददास खींची की सहायता से अजीतसिंह को दिल्ली से मुक्त कराया।

➥ अजीतसिंह को सिरोही के पास जयदेव नामक ब्राह्मण के घर लालन-पालन के लिए छोड़ा गया।

➥ दुर्गादास के प्रयासों से अजीत सिंह मारवाड़ का शासक बना।

मुगल बादशाह फर्रुखशियर से जीत सिंह ने अपनी पुत्री इंद्र कुवंरी का विवाह किया।

➥ अजीत सिंह के पुत्र बख्त सिंह ने 1724 में अजीत सिंह की हत्या कर दी।

➥ गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने अजीत सिंह को कान का कच्चा कहा।

➥ अजीत सिंह की मृत्यु के बाद अभय सिंह शासक बना।

अभय सिंह के काल में 1730 में 363 लोगों के साथ खेजडली गाँव जोधपुर में खेजडी के वृक्षों को बचाने के लिए अमृता देवी – बिसनोई शहीद हो गई।

जोधपुर जिले के खेजडली गाँव में भाद्र शुक्ला दशमी के दिन विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला लगता है।

1818 में चाल्स मेट कॉफ के प्रयासों से मान सिंह राठौड़ ने ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ सहायक संधि को।

राजस्थान में पहली बार ईस्ट इंडिया कंपनी से सहायक संधि का उल्लंघन मानसिंह राठौड़ ने किया।

मानसिंह नाथ सम्प्रदाय में दीक्षित थे।

मानसिंह ने जोधपुर में महामंदिर का निर्माण करवाया।

महामंदिर जालंधर नाथ को समर्पित है।

मुगल – बीकानेर संबंध

जैत्रसिंह / जैतसी(1526-1542) :-

राव जैत्रसिंह ने खानवा के युद्ध में राणा सांगा का साथ दिया।

1540 में हुमायु के भाई कामरान व बीकानेर के जैत्रसिंह के बीच भटनेर का युद्ध हुआ। जिसमें कामरान पराजित हुआ।

1542 में मारवाड़ के शासक मालदेव व जैतसी के बीच साहवा का युद्ध हुआ। जिसमें मालदेव के सेनापति जैता व कूपा से लड़ते हुए जैतसी ने वीरगति पाई।

1544 में जब शेरशाह सूरी ने मारवाड़ पर आक्रमण किया तो गिरी सुमेल के युद्ध में कल्याणमल ने शेरशाह की सहायता की और मालदेव से बदला लिया।

कल्याणमल ने शेरशाह सूरी की अधीनता स्वीकार की।

1570 में अकबर द्वारा आयोजित नागौर दरबार में कल्याणमल ने अकबर की अधीनता स्वीकार की तथा अपने पुत्रों रायसिंह व कुवंर पृथ्वीराज की नियुक्ति दरबार में करवा दी।

महाराजा राय सिंह (1574-1612) : –

मुंशी देवी प्रसाद ने इन्हें राजपूताने का कर्ण कहा है।

अकबर ने इन्हें जोधपुर का सूबेदार बनाया।

1574 में राय सिंह ने सिरोही पर आक्रमण करके आधे सिरोही को मुगल साम्राज्य का अंग बनाया एवं महाराणा प्रताप के छोटे भाई जगमाल को आधे सिरोही का शासक नियुक्त किया।

1583 में राव सुरताण देवड़ा ने जगमाल पर आक्रमण कर दिया। फलस्वरूप दोनों के बीच दत्ताणी का युद्ध हुआ। जिसमें जगमाल मारा गया।

रायसिंह अकबर के दरबार में मानसिंह के बाद दूसरे नम्बर का उच्च श्रेणी का मनसबदार था।

रायसिंह अकबर व जहांगीर का समकालीन था।

रायसिंह ने 1589 में बीकानेर के जुनागढ़ किले का निर्माण करवाया। तथा उसके दरवाजे पर जयमल व फत्ता की मूर्तियाँ लगाई।

1612 में बुरहानपुर (मध्य प्रदेश में) रायसिंह का देहान्त हो गया।

सर सिंह (1613-1631) :-

सूर सिंह ने ओरछा के राजा जूझार सिंह बुन्देला के विरुद्ध मुगल सेना का नेतृत्व किया। और जूझार सिंह को मुगलों की अधीनता स्वीकार करने पर बाध्य किया।

महाराजा कर्ण सिंह (1631-1669) :-

औरंगजेब ने इन्हें जांगलधर बादशाह की उपाधि प्रदान की।

शाहजहां के पुत्रों में हुये उत्तराधिकार के संघर्ष में कर्ण सिंह तटस्थ रहा। लेकिन अपने पुत्रों पद्मसिंह और केसरी सिंह को औरंगजेब के पक्ष में भेजा।

कर्ण सिंह के समय नागौर व बीकानेर के बीच मतीरे की राड़ हुई।

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