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मेवाड़ का इतिहास (Mewar Ka Itihas) (History of Mewar) part-2 - gk website
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मेवाड़ का इतिहास (Mewar Ka Itihas) (History of Mewar) part-2

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-: राजस्थान का इतिहास :-

मेवाड़ का इतिहास
मेवाड़ का इतिहास

मेवाड़ का इतिहास

रायमल (1473-1509) :-

रायमल के जीवन काल की सबसे बड़ी समस्या योग्य उत्तराधिकारी का चयन न कर पाना था।

रायमल के तीन पुत्र पृथ्वीराज, जयमल व सांगा के बीच रायमल के जीवनकाल में ही उत्तराधिकार का संघर्ष छिड़ गया।

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इस संघर्ष को हवा देने वाले मेवाड़ के सामन्त सारंग देव व सूरजमल थे।

राजकुमार पृथ्वीराज को उसके बहनोई सिरोही के राव जगमाल ने जहर दे दिया। इससे पृथ्वीराज की मृत्यु हो गई।

जयमल टोडा रायसिंह के सोलंकीयों से लड़ता हुआ मारा गया।

संकट काल में महाराणा सांगा को अजमेर के कर्मचंद पंवार ने शरण दी।

महाराणा संग्राम सिंह/राणा सांगा (1509–1528) :-

राणा सांगा (1509–1528) – रायमल व रानी रतन कुंवर के पुत्र राणा सांगा का जन्म 12 अप्रैल, 1482 के दिन चित्तौड़गढ़ किले में हुआ।

राणा सांगा 16वीं शताब्दी शक्तिशाली शासक था।

राणा सांगा की उपाधि हिंदूपत

राणा सांगा के शरीर पर 80 घाव थे।

राणा सांगा को मानव का खण्डहरसैनिक भग्नावषेश कहा जाता है।

अपने भाइयों से त्रस्त राणा सांगा ने अजमेर के कर्मचंद पंवार के यहाँ शरण ली।

शासक बनने पर राणा सांगा ने कर्मचंद पंवार को रावत की उपाधि प्रदान की।

राणा सांगा द्वारा किए गए युद्ध :-

1. खातोली का युद्ध (1517) – दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी से हुआ। जिसमें राणा सांगा विजयी हुआ।

2. गागरोण का युद्ध (1518-19) – मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी को युद्ध में परास्त किया।

3. बाडी का युद्ध (1519) – इब्राहिम लोदी को पुनः परास्त किया।

Note 1 :- इब्राहिम लोदी के सिपहसालार दौलत खां लोदी व आलम खां लोदी ने बाबर को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए निमंत्रण दिया।

Note 2 :- इब्राहिम लोदी व बाबर के बीच 21 अप्रैल, 1526 में पानीपत का प्रथम युद्ध हुआ। जिसमें इब्राहिम लोदी लड़ता हुआ मारा गया तथा दिल्ली व आगरा पर बाबर का अधिकार हो गया।

4. बयाना का युद्ध (1527) – बाबर परास्त हुआ व राणा सांगा विजयी हुआ।

बयाना के युद्ध के पश्चात् बाबर की सेना का हौसला पूर्णतयाः नष्ट हो गया था और वे युद्ध करने की स्थिति में नहीं थे। तब बाबर ने जिहाद का नारा दिया।

5. खानवा का युद्ध (17 मार्च, 1527) –

राणा सांगा के सहयोगी ⤵️

1. आमेर के पृथ्वीराज कच्छवाह

2. मारवाड़ के रावगंगा व पुत्र मालदेव

3. बीकानेर के राजा जैतसिंह

4. मेड़ता के वीरमदेव मेडतीय

5. मेवात (अलवर) के हशन खां मेवाती

6. वागड़ के उदय सिंह

7. ईडर (गुजरात) के भारमल

8. चन्देरी के मेदीनीराय

9. जगनेर (उ.प्र.) अशोक परमार

10. इब्राहिम लोदी के चचरे भाई महमूद लोदी

11. खण्डार का सलहदी तँवर

Note :- खानवा के युद्ध में बाबर ने तुलगमा विधि का प्रयोग किया। यह विधि बाबर ने उजबेगों से सीखी थी।

Note :- बाबर के तोपची मुस्तफा व उस्ताद अली थे। तोप का प्रयोग बाबर ने इरानियों से सीखा।

खानवा के युद्ध में राणा सांगा की पराजय हुई व बाबर जीता।

विजय के उपरान्त खानवा के युद्ध में बाबर ने गाजी की उपाधि धारण की।

इस युद्ध में घायल अवस्था में सांगा को झाला अज्जा व मालदेव ने सुरक्षित निकाला।

राणा सांगा बाबर को पराजित करने की योजना बनाने लगा। लेकिन उसके सामन्तों ने कालपी (म.प्र.) में राणा सांगा को विष दे दिया।

बसवा (दौसा) में राणा सांगा की मृत्यु 30 जनवरी, 1528 के दिन हुई। जहाँ आज भी चबूतरा बना हुआ है।

राणा सांगा का अंतिम संस्कार माण्डलगढ़ (भीलवाड़ा) में हुआ। जहाँ राणा सांगा की 32 खम्भों की छतरी बनी हुई है।

बाबर नामा के लेखक बाबर के अनुसार मुझे भारत पर आक्रमण करने के लिए मेवाड़ के महाराणा सांगा, दौलात खां लोदी व आलम खां लोदी ने आमंत्रण दिया है।

बाबर के इस कथन को इतिहास का असत्य मानते हैं।

खानवा के युद्ध में पराजित होने पर राणा सांगा का कथन “जब तक मैं मेरी हार का बदला न ले लूँ जीवित रहते हुए मेवाड़ की भूमि में पाँव नहीं रलूँगा।

महाराणा सांगा की मृत्यु के बाद रतन सिंह मेवाड़ का शासक बना। जिसने 1528 से 1531 तक

शासन किया।

अपने ननिहाल बूंदी में शिकार खेलते समय रत्न सिंह की मृत्यु होने पर विक्रमादित्य मेवाड़ का शासक बना।

विक्रमादित्य के समय मेवाड़ पर गुजरात के बहादूर शाह ने 1534 में आक्रमण किया।

इस युद्ध में मेवाड़ का दूसरा साका हुआ।

युद्ध में सहायता प्राप्त करने के लिए विक्रमादित्य की माँ व संरक्षिका कर्मावति ने हुमायू के पास राखी भेजी। लेकिन हुँमायू ने कोई सहायता नहीं की।

इस युद्ध में मेवाड़ की पराजय हुई। तथा रानी कर्मावति के नेतृत्व में जौहर हुआ। तथा बाघसिंह के नेतृत्व में केशरिया हुआ।

उडना राजकुमार पृथ्वीराज के अवैध पुत्र बनवीर ने विक्रमादित्य कर दी।

बनवीर उदय सिंह को भी मारना चाहता था। लेकिन उसकी धाय माँ पन्ना ने अपने पुत्र का बलिदान देकर उदय सिंह को बचाया।

पन्ना धाय ने उदय सिंह को कुम्भलगढ़ पहुँचा दिया। वहीं उदय सिंह का राजतिलक हुआ।

महाराणा उदय सिंह (1537 – 1572) :-

1544 में उदय सिंह ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग की चाबियाँ शेरशाह सूरी को सौंप कर उसकी अधीनता स्वीकार की।

उदय सिंह ने उदय सागर झील का निर्माण करवाया।

उदय सिंह ने 1559 में उदयपुर शहर बसाया।

उदय सिंह के समय 1567-68 में मुगल शासक अकबर ने मेवाड़ पर आक्रमण किया।

सामन्तों की सलाह पर महाराणा उदय सिंह परिवार सहित गोगुन्दा (उदयपुर) चला गया।

मेवाड़ के सेनापतियों जयमल मेड़तिया व फत्ता सिसोदियाअकबर की सेना के मध्य 1568 में युद्ध हुआ।

इसी युद्ध के समय मेवाड़ का तीसरा व अंतिम साका हुआ।

इस युद्ध में फत्ता सिसोदिया की पत्नी फूल कंवर के नेतृत्व में जौहर हुआ। तथा जयमल – फत्ता के नेतृत्व में केशरिया हुआ।

फत्ता सिसोदिया की छतरी चित्तौड़गढ़ किले के रामपोल दरवाजे पर है। तथा जयमल व काल्लाजी राठौड़ की छतरियाँ भैरवपोल दरवाजे पर है।

अकबर ने जयमल व फत्ता की वीरता से प्रभावित होकर उनकी गजारूढ़ पाषाण प्रतिमाएँ आगरा के किले के दरवाजे पर लगाई।

जयमल व फत्ता की ऐसी पाषाण प्रतिमाएँ बीकानेर के राजा रायसिंह ने जूनागढ़ किले के दरवाजे पर लगाई।

इस युद्ध में विजय के उपरान्त अकबर ने फतहनामा जारी किया।

इस युद्ध के बाद अकबर ने अपनी सेना को चित्तौड़ में कत्लेआम का आदेश दिया। जिसमें 30,000 हिन्दूओं को मौत के घाट उतार दिया।

यह घटना अकबर के जीवन का अमिट कलंक कहलाती है।

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