महाराणा प्रताप (Maharana Pratap)

 महाराणा प्रताप (1540 से 1597)
(Maharana Pratap)

Maharana-Pratap
Maharana-Pratap

✔️ वीर विनोद के लेखक कवि श्यामल दास के अनुसार प्रताप का जन्म 15 मई 1539 को हुआ ।
✔️ नैणसी के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को हुआ । (सर्वमान्य)
✔️ कर्नल टॉड़ द्वारा रचित पुस्तक “द सेन्ट्रल एण्ड वेस्टर्न राजपूत स्टेटस ऑफ इण्डिया” के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1549 को कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ ।

✔️ महाराणा प्रताप को वनवासी बाल्यकाल में कीका नाम से पुकारते थे ।

✔️ महाराणा प्रताप के पिता उदय सिंह ने महाराणा प्रताप के स्थान पर भटीयाणी राणी के पुत्र जगमाल को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया । किन्तु 28 फरवरी 1572 को महाराणा प्रताप समर्थकों ने गोगुन्दा में महाराणा प्रताप को शासक घोषित किया ।

✔️ महाराणा प्रताप का पहला राज्याभिषेक गोगुन्दा में हुआ जबकि दूसरा विधिवत् राज्याभिषेक कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ

✔️ सन् 1570 में नागौर दरबार के समय राजपूताने के अधिकांश शासकों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी ।

✔️ सन् 1570 के समय अकबर ने अपनी अजमेर यात्रा के समय नागौर में शुक्र तालाब का निर्माण करवाया था।

✔️ नागौर दरबार का महत्व इसलिये है क्योंकि इसमें राजस्थान के अधिकांश राजपूत शासकों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली किन्तु स्वतन्त्रता प्रेमी महाराणा प्रताप अकबर के विरोधी बने रहे ।

✔️ अकबर द्वारा महाराणा प्रताप को समझाने हेतु चार शिष्ट मण्डल भेजे जिनका विवरण निम्नानुसार है ।

1. जलाल खाँ :- नवम्बर 1572
2. मानसिंह प्रथम :- जून 1573
3. भगवन्त दास :- सितम्बर 1573
4. टोडरमल :- दिसम्बर 1573
(झुन्झुनूं- उदयपुरवाटी तहसील किरोड़ी गाँव में स्मारक)
हल्दीघाटी का युद्ध (Haldighati Ka Yudh)
✔️ इतिहास प्रसिद्ध युद्ध हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा प्रताप तथा अकबर की सेनाओं के मध्य लड़ा गया था । इसमें अकबर की सेनाओं का नेतृत्व हिन्दू शासक मानसिंह तथा आसफ खाँ द्वारा किया गया ।
✔️ महाराणा प्रताप की सेना का नेतृत्व मुस्लिम सरदार हाकिम खाँ सूरी द्वारा किया गया ।
✔️ इस आधार पर कहा जा सकता है कि हल्दीघाटी का युद्ध धर्मयुद्ध अथवा जेहाद का नही था
✔️ हल्दीघाटी का युद्ध माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की पुस्तकों के अनुसार 18 जून 1576 को लड़ा गया । जबकि हिन्दी साहित्य ग्रन्थ अकादमी की पुस्तकों के अनुसार 21 जून 1576 को लड़ा गया । राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा 2010 में दिये गये निर्णय के अनुसार हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 को लड़ा गया ।
✔️ राजस्थान के इतिहास नामक पुस्तक के लेखक डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार यह युद्ध अनिर्णायक युद्ध था क्योकि अकबर अपने तीनों ही उद्देश्यों में असफल रहा ।
नोट :- हल्दीघाटी के युद्ध को कर्नल टॉड़ ने “मेवाड़ का थर्मोपॉली” कहा । बदायूनी ने “गोगुन्दा का युद्ध” अबुल फजल ने ” खमनौर का युद्ध’ कहा है । ✔️ हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने कुम्भलगढ़ को राजधानी बनाया ।

✔️ आसफ खाँ ने हल्दीघाटी के युद्ध को “जेहाद’ की संज्ञा दी है, जबकि ए.एल. श्रीवास्तव ने हल्दीघाटी के युद्ध को “बादशाह बाग” कहा है ।

✔️ हल्दीघाटी युद्ध के बाद भी अकबर स्वयं उदयपुर आया तथा चार महिने यहां ठहरा । इस समय अकबर उदयपुर का नाम बदलकर मुहम्मदाबाद कर दिया था ।

✔️ हल्दीघाटी युद्ध के बाद भी अकबर ने महाराणा प्रताप के विरूद्ध लगातार अभियान जारी रखे । उसने 1577, 1578 व 1579 में 3 बार शहाबाज खाँ को प्रताप के विरूद्ध भेजा लेकिन शहाबाज खाँ को सफलता नही मिली ।

✔️ सन् 1580 में अब्दुल रहीम खानखाना को महाराणा प्रताप के विरूद्ध भेजा गया । महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह प्रथम ने खानखाना के परिवार की महिलाओं को बन्दी बना लिया इस बात का पता जब प्रताप को लगा तो उन्होने अमर सिंह को खानखाना के परिवार के बंन्दी बनाये गये सदस्यों को सम्मानजनक छोड़ने की बात कही । इसके उपरान्त खानखाना ने प्रताप के विरूद्ध प्रतिशोध की नीति का परित्याग कर दिया ।

नोट :- अकबर ने महाराणा प्रताप के विरूद्ध अंतिम रूप से 1584-85 में जगन्नाथ कच्छवाहा को भेजा ।

✔️ महाराणा प्रताप ने 1585 में लूणा चावण्डिया को पराजित करके चावण्ड को अपनी राजधानी बनाया जो कि आगामी 28 वषों तक मेवाड की राजधानी रही ।

✔️ सन् 1582 में दिवेर के युद्ध से महाराणा प्रताप ने मुगलों के विरूद्ध प्रतिशोध अभियान प्रारम्भ किया। इस युद्ध को मेवाड़ का मैराथन कहा जाता है, क्योकि यहां से मेवाड़ की मुक्ति का एक लम्बा इतिहास आरम्भ हो जाता है ।

✔️ सन् 1583 में सिरोही के देवड़ा सूरताण तथा महाराणा प्रताप के भाई जगमाल के मध्य दत्ताणी का युद्ध लड़ा गया इसमें जगमाल मारा गया ।

✔️ जब युद्ध के समय महाराणा प्रताप को धन की आवश्यकता थी ऐसे समय में भामाशाह तथा उनके भाई ताराचन्द ने चूलिया नामक स्थान पर अपनी सम्पत्ति भेंट की थी । भामाशाह का जन्म भारमल (ओसवाल परिवार पाली) के यहां हुआ ।

✔️ 19 जनवरी 1597 को धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाते समय चोट लग जाने के कारण वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप का निधन हो गया ।

✔️ कवि दुरसा आड़ा ने महाराणा प्रताप की मृत्यु पर लिखा है कि “जिन्होने कभी अपने घोड़ों को नही अड़ने दिया, जिनकी तलवारें हमेशा रक्त से उज्ज्वल बनी रही । ऐसे वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप व चन्द्रसेन पूरे भारत के सिरमौर है” |

महाराणा प्रताप से सम्बन्धित अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
✔️ हल्दीघाटी युद्ध के समय महाराणा प्रताप का शस्त्रागार “मायरा की गुफा” (उदयपुर) नामक स्थान पर था ।
✔️ हल्दीघाटी युद्ध के समय घायलों का इलाज कोल्यारी गाँव में होता था ।
✔️ महाराणा प्रताप के प्रिय घोड़े का नाम चेतक तथा हाथी का नाम रामप्रसाद था ।
नोट :- हल्दीघाटी युद्ध के बाद मानसिंह ने महाराणा प्रताप के हाथी रामप्रसाद को उपहार स्वरूप अकबर को भेंट किया तथा अकबर ने हाथी का नाम बदलकर पीरप्रसाद कर दिया था ।
✔️ चेतक का स्मारक वलीचा ग्राम में स्थित है ।
✔️ महाराणा प्रताप का दाह संस्कार बाडोली नामक स्थान पर किया गया, जहाँ वर्तमान में महाराणा प्रताप का समाधि स्थल है । यहीं पर आठ खम्भों की छतरी स्थित है । प्रताप का देहान्त 19 जनवरी 1597 में राजधानी चावण्ड में हुआ था तथा दाह संस्कार बाड़ोली में किया गया ।
✔️ चक्रपाणि मिश्र प्रताप के दरबारी कवि थे इन्होने विश्व वल्लभ, मुहूर्त माला तथा राज्याभिषेक पद्धति नामक ग्रन्थ लिखें।
✔️ रामा सांदू और माला सांदू प्रसिद्ध चारण कवि थे । माला सान्दू ने “महाराणा प्रताप का झूलणा” (राजस्थानी साहित्य में मात्रिक छन्द) नामक ग्रन्थ लिखा जिसमें बप्पा रावल से लेकर महाराणा प्रताप तक का मेवाड़ का इतिहास मिलता है ।
✔️ महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक “मालाणी” नस्ल का था ।
✔️ राष्ट्रीय आन्दोलन के समय आर.सी. मजूमदार ने प्रताप के संघर्षमय जीवन पर “राजपुत जीवन संध्या’ नामक उपन्यास लिखा है ।
✔️ बंकिम चन्द्र चटर्जी ने भी “राजसिंह उपन्यास तथा मेवाड़ के दो शक्तिशाली शासक” नामक उपन्यास लिखे है ।
✔️ जाड़ा मेहतु तथा दुरसा आड़ा दोनों प्रताप के समकालीन थे ।
✔️ गोरा-बादल, पद्मनी चरित्र चौपाई के लेखक हेमरत्न मुनी है ।

✔️ सुजानगढ़ चुरू में जन्मे कन्हैया लाल सैठिया ने भी प्रताप के पुत्र अमर सिंह तथा वन बिलाव की घटना का मर्म स्पर्शी का वर्णन किया है ।
✔️ प्रताप के हल्दीघाटी युद्ध में घायल होने पर युद्ध का संचालन झाला बीदा ने किया था ।
✔️ बदायुनी ने अपने ग्रन्थ “मुन्तकाफ उल तवारिख” में हल्दीघाटी का आँखों देखा वर्णन लिखा है ।

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