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ढूंढाड़ का इतिहास (History of Dhoondhar) (Dhoondhar Ka Itihas) - gk website
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ढूंढाड़ का इतिहास (History of Dhoondhar) (Dhoondhar Ka Itihas)

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ढूंढाड़ का इतिहास
(History of Dhoondhad)

Dhundhar-Rajasthan
Dhundhar-Rajasthan

कछवाहा राजवंश का इतिहास (History of Kachwaha Vansh):- कछवाह राजवंश स्वयं को भगवान राम के पुत्र कुश का वंशज मानते है । मूल रूप से ये नरवर (मध्यप्रदेश) के निवासी थे ।
✔️ नरवर के शासक सोढ़ा सिंह के पुत्र दुल्हेराय ने दौसा के बड़गुर्जरों को पराजित कर सन् 1137 में इस वंश की नीव रखी । भारमल इस वंश का प्रतापी शासक हुआ जो 1547 में कछवाह राजवंश का शासक बना ।
नोट :- भारमल राजस्थान का प्रथम शासक था जिसने मुगलों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए तथा अपनी पुत्री हरका बाई (Harka Bai) का विवाह अकबर के साथ किया । यह विवाह सांभर में सम्पन्न हुआ । हरका बाई को “मरियमउज्मज्जानी” के नाम से भी जाना जाता है |
✔️ भारमल को अकबर ने अमीर-उल-उमरा तथा राजा की उपाधि प्रदान की । भारमल ने 1558 में आमेर दुर्ग का निर्माण करवाया ।
✔️ भारमल की मृत्यु के बाद उसका पुत्र भगवन्त दास 1573 में आमेर का शासक बना । इसे 5000 का मनसब प्रदान किया गया ।
✔️ भगवन्त दास की पुत्री का नाम मानबाई था जिसका विवाह अकबर के पुत्र जहांगीर से हुआ था । खुसरों जहांगीर एवं मानबाई का पुत्र था । खुसरों ने अपने पिता के विरूद्ध विद्रोह कर दिया । जहांगीर ने खुसरों को अन्धा करवा दिया तथा मानबाई ने खुसरों की हत्या करवा दी । अन्त में मानबाई ने भी अफीम की गोलियाँ खाकर आत्महत्या कर ली ।

✔️ मानबाई को इतिहास की प्रथम पुत्रहन्ता महिला माना जाता है ।

✔️ भगवन्तदास का पुत्र मानसिंह था जिसने 1589 से 1614 तक शासन किया । मानसिंह प्रथम का जन्म 1550 में मौजमाबाद (Mojamabad) में हुआ था ।

✔️ बंगाल अभियान के दौरान मानसिंह के 3 पुत्र जगत सिंह, हिम्मत सिंह तथा दुर्जन सिंह (Jagat Singh, Himmat Singh and Durjan Singh) मारे गए ।

नोट :- मानसिंह की पत्नी रानी कनकावती (Kankavati) ने अपने पुत्र जगतसिंह की स्मृति में जगतशिरोमणी मन्दिर (Jagatashromani Temple) का निर्माण करवा इसमें भगवान कृष्ण की काले रंग की वही प्रतिमा है जिसकी मीरां बाई पूजा किया करती थी । यह मन्दिर पाल शैली (Pal Shaili)में बना हुआ है ।

✔️ मानसिंह ने बंगाल के शासक केदारनाथ (Kedarnath) को पराजित करके शीलादेवी (Shiladevi) की प्रतिमा को आमेर के राजमहलों में स्थापित करवाया ।

नोट 1 :- शीलादेवी को जयपुर के शासकों की इष्टदेवी माना जाता है जबकि जमुवाय माता को जयपुर की शासकों की कुलदेवी या आराध्य देवी माना जाता है ।

नोट 2 :- जमवारामगढ़ (जयपुर) (Jamwaramgarh (Jaipur)) को गुलाब उत्पादन के कारण “ढुढ़ाड़ का पुष्कर” कहा जाता है ।

✔️ अकबर ने मानसिंह को “फर्जन्द” तथा “राजा’ (“Furzand” and “Raja”) की उपाधि प्रदान की

✔️ अकबर द्वारा मानसिंह को प्रारम्भ 5000 का मनसब दिया गया, किन्तु इसे अन्तिम दिनों में बढ़ाकर 7000 कर दिया गया ।

✔️ महाराणा प्रताप तथा मानसिंह की मूलाकात उदयसागर की पाल (Uday Singh Ki Pal) में हुई थी । कुंवर अमर सिंह ने मानसिंह के लिये पिछोला झील के तट पर रात्रि भोज का आयोजन किया था । सन् 1614 में दक्षिण के एलीचपुरा (Elichpura)नामक स्थान पर मानसिंह प्रथम की मृत्यु हो गई ।

✔️ मानसिंह ने पुष्कर में मानमहल का निर्माण करवाया जहां वर्तमान में R.T.D.C. होटल संचालित किया जा रहा है ।

✔️ कवि हापा बारहठ तथा दादू दयाल जी (Hapa Barth and Dadu Dayal Ji) मानसिंह के समकालीन थे । मानसिंह के समय जगन्नाथ ने मानसिंह कीर्ति मुक्तावली (Muktavali)नामक ग्रन्थ लिखा । ऐसा माना जाता है कि तुलसीदास जी तथा मानसिंह में घनिष्ट मित्रता थी ।

✔️ मानसिंह प्रथम की मृत्यु के बाद 1614 से 1621 तक भावसिंह (Bhavsingh)ने शासन किया लेकिन इसकी निःसंतान मृत्यु हो गई ।

मिर्जा राजा जयसिंह (1621 से 1668) (Mirja Raja Jaisingh)

✔️ सन् 1621 में भावसिंह की मृत्यु के बाद मानसिंह व दमयन्ती का पुत्र जयसिंह गद्दी पर बैठा । इनका लालन-पालन दमयन्ती देवी (Damyanti Devi) ने दौसा में किया ।

नोट :- 11 वर्ष की उम्र में शासक बनने के बाद उसने तीन मुगल सम्राट जहांगीर, शहाजहां तथा औरंगजेब की सेवा की ।

✔️ सन् 1638 में शाहजहाँ ने इन्हे मिर्जा राजा जयसिंह की उपाधि प्रदान की।

✔️ जून 1665 में जयसिंह तथा शिवाजी के मध्य पुरन्दर की सन्धि (Purandr ki Sandhi) के तहत शिवाजी ने औरंगजेब की अधीनता स्वीकार कर ली किन्तु यह सन्धि क्षणिक सिद्ध हुई है ।

✔️ औरंगाबाद में जयसिंह ने जयसिंहपुरा (Jaisinghpura) नामक कस्बे की स्थापना की । जयसिंह ने जयगढ़ दुर्ग (Jaigarh Durg) का निर्माण करवाया ।

✔️ इनके दरबार में हिन्दी के श्रेष्ठ कवि बिहारी (Kavi Biharee) निवास करते थे जिन्होने “बिहारी सतसई” (Bihari satsae)नामक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा

✔️ बिहारी मूल रूप से “मध्यप्रदेश” प्रान्त के निवासी थे ।

✔️ मिर्जा राजा जयसिंह के दरबार में जयसिंह चरित्र (Jaisingh Charitr) के लेखक रामकवि आश्रय (Ramkavi aashray) पाते थे ।

✔️ 2 जूलाई 1668 को दक्षिण से लौटते समय बुहारनपुर (Buharanpur) नामक स्थान पर मिर्जा राजा जयसिंह की मृत्यु हो गई ।

सवाई जयसिंह (सन् 1700 से 1743) (Sawai Jaisingh)

✔️ जय सिंह द्वितीय का जन्म 3 सितम्बर 1688 को हुआ था । इनके पिता का नाम विशन सिंह (Vishan Singh)था । औरंगजेब ने इन्हे सवाई की उपाधि प्रदान की ।

✔️ सवाई जयसिंह ने अजीत सिंह की पुत्री सुरजकंवरी (Surajkanvari) से विवाह किया था।

✔️ 17 जूलाई 1734 को मराठों के आक्रमणों को रोकने के लिये वर्तमान भीलवाड़ा के हुरड़ा (Hurada) नामक स्थान पर एक सम्मेलन बुलाया गया । इसकी अध्यक्षता मेवाड़ के तत्कालीन महाराणा जगत सिंह द्वितीय द्वारा की गई।

✔️ जयसिंह के काल में 18 नवम्बर 1727 को जयपुर की नींव रखी गई । जयपुर शहर का वास्तुकार बंगाली ब्राह्मण विद्याधर भट्टाचार्य (Bengali Brahmin Vidyadhar Bhattacharya) था ।
✔️ सवाई जयसिंह एक धर्मरक्षक शासक व अंतिम हिन्द शासक था जिसने 1740 में अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन करवाया था, इसके पुरोहित पुण्डरीक रत्नाकर (Pundarik Ratnakar) थे । सन् 1733 में जयसिंह ने नक्षत्रों की गणना हेतु “जीज मुहम्मद शाही” (Jeez Muhammad Shahi) का निर्माण करवाया । (नक्षत्रों की गणना के लिये शुद्व सारणी है)
✔️ सवाई जयसिंह ने पाँच वेद्य शालाओं का निर्माण करवाया । दिल्ली, जयपुर, मथुरा, बनारस तथा उज्जैन (Delhi, Jaipur, Mathura, Benaras and Ujjain)। इनमें सबसे पहले दिल्ली वेद्यशाला को बनवाया । इनमें सबसे बड़ी जयपुर वेद्यशाला है ।
✔️ 1 सितम्बर 1743 को सवाई जयसिंह की मृत्यु हो गई । जयबाण तोप (JaiBan Top) का निर्माण सवाई जयसिंह ने करवाया था । यह एशिया की सबसे बड़ी तोप है ।

सवाई ईश्वर सिंह (1743 से 1750 तक) (Sawai Ishwar Singh)

✔️ सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद ढुढ़ाड़ का शासक बना । उसके छोटे भाई माधोसिंह ने राज्य प्राप्ति हेतु मराठों व कोटा-बूंदी की संयुक्त सेना के साथ जयपुर पर आक्रमण किया ।
✔️ बनास नदी के तट पर सन् 1747 में राजमहल (Rajmahal)(टोंक) नामक स्थान पर हुए युद्ध में ईश्वर सिंह की विजय हुई । इस विजय के उपलक्ष्य में जयपुर के त्रिपोलिया बाजार में ईसरलाट (सरगासुली) (Isarlat (Sargasuli) in Tripolia market) का निर्माण करवाया ।
✔️ सन् 1750 में मराठा सरदार राव होल्कर (Sardar Rao Holkar) ने जयपुर पर आक्रमण किया, इससे परेशान होकर ईश्वरी सिंह ने आत्महत्या कर ली ।

सवाई माधोसिंह प्रथम (1751 से 1768 तक) (Sawai Madhosingh I)

✔️ ईश्वर सिंह के आत्महत्या करने के बाद माधोंसिंह गद्दी पर बैठा । माधोसिह ने मुगल बादशाह अहमद शाह एवं बाब सफदर जंग के मध्य समझौता करवाया । इससे प्रसन्न होकर बादशाह ने रणथम्भोर का किला माधोंसिंह को दे दिया । इससे नाराज कोटा नरेश शत्रुसाल ने सन् 1761 में हुए भटवाड़ा युद्ध (Bhatvada Yudh) में जयपुर की सेना को पराजित किया । इस युद्ध की जानकारी हमें शत्रुसाल रासों (SatruSal Raso) से मिलती है ।
नोट :- सन् 1763 में माधोंसिंह प्रथम ने अपने नाम पर सवाई माधोपुर नगर (Sawai Madhopur Nagar) बसाया तथा इन्होने जयपुर में मोती डूंगरी महलों (Motee Dungari Mahal) का निर्माण करवाया । सन् 1768 में इनकी मृत्यु हो गई ।

सवाई प्रताप सिंह (1778 से 1803 तक) (Swai Pratap Singh)

✔️ महाराजा पृथ्वी सिंह की मृत्यु के बाद उनके अनुज प्रतापसिंह ने जयपुर का शासन सम्भाला इनके समय फरवरी 1798 में अंग्रेजी सेनापति जार्ज थॉमस ने जयपुर पर आक्रमण किया ।

नोट :- सवाई प्रताप ने जोधपुर नरेश विजय सिंह (Vijay Singh) के सहयोग से महादजी सिंधिया की सेना को सन् 1787 में तूंगा की लड़ाई (Tunga Ki Ladae) में पराजित किया । वर्तमान में यह स्थान दौसा जिले में स्थित है । महादजी सिंधिया ने लूँगा की हार का बदला पाटन के युद्ध (Patan Ka Yudh) में लिया । जिसमें सिन्धिया के सेनापति डी. बॉय ने जयपुर की सेना को पराजित किया ।

नोट :- प्रताप सिंह के काल में कला एंव साहित्य की अत्यधिक उन्नति हुई । इन्होने “ब्रज भाषा” (Braj Bhasha) को सर्वाधिक महत्व दिया । इन्होने जयपुर में एक संगीत सम्मेलन करवा कर “राधा-गोविन्द संगीतसार” ग्रन्थ (Radha-Govind Sangeetaras) की रचना करवाई । जिसके लेखक देवर्षि ब्रजपाल भट्ट(Devarshi Brajpal Bhatt) है । इन्होने जयपुर में हवामहल का निर्माण करवाया । इसका वास्तुकार लाल चन्द (Lal Chand) था | यह पाँच मंजिला है तथा 953 खिड़कियाँ है । इसकी प्रथम मंजिल का नाम शरद मंजिल एवं अंतिम मंजिल का नाम हवा मंजिल है ।

जगतसिंह द्वितीय (1803 से 1818) (Jagatsingh II)

✔️ प्रताप सिंह की मृत्यु के बाद जगत सिंह शासक बने । जगत सिंह के समय जयपुर एवं जोधपुर महाराजा मानसिंह के मध्य मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी (Krishna Kumari) के विवाह को लेकर सन् 1807 में गिंगोली का युद्ध (Battle of Gingoli) लड़ा गया जिसमें जयपुर की सेनाओं ने मारवाड़ की सेनाओं को पराजित किया । अन्त में अमीर खां के पिण्डारी के हस्तक्षेप के चलते कृष्णा कुमारी को जहर दे दिया गया ।

✔️ 21 दिसम्बर 1818 को जगत सिंह द्वितीय की मृत्यु हो गई।

महाराजा राम सिंह द्वितीय (1835 से 1880 तक) (Maharaja Ram Singh II)

✔️ ये 16 वर्ष की आयु में शासक बने । इस समय ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने जयपुर को अपने संरक्षण में ले रखा था ।

✔️ न् 1843 में मेजर जॉन लूडलो ने जयपुर का प्रशासन सम्भाला तथा इन्होने सतीप्रथा, दासप्रथा, कन्या प्रथा तथा दहेज प्रथा (Satipratha, Dasapratha, Kanya Pratha and Dahej Pratha) पर रोक लगाने के प्रयास किये

✔️ 1857 की क्रान्ति के समय रामसिंह द्वितीय ने अंग्रेजों की सहायता की । अंग्रेजों ने प्रसन्न होकर सितार ए हिन्द (Sitar E Hind) की उपाधि प्रदान की ।

नोट :- सन् 1870 में वायसराय लॉर्ड मेयों ने जयपुर व अजमेर की यात्रा की तथा 1870 में इन्होने अजमेर में आयोजित दरबार में मेयो कॉलेज (Mayo college) की स्थापना की घोषणा की ।
नोट :- इन्ही की पहल पर 1876 में अजमेर मे मेयो कॉलेज की स्थापना हुई ।
✔️ इन्होने 1868 में प्रिन्स अलबर्ट (Prince albert) के स्वागत के लिये जयपुर को गेरू रंग (Ocher color) से रंगवाया ।
✔️ महाराजा राम सिंह द्वितीय के समय जयपुर में 1845 में महाराजा कॉलेज एवं संस्कृत कॉलेज (Maharaja College and Sanskrit College) की स्थापना हुई । इन्ही के समय रामबाग पैलेस (Rambagh Palace) स्थापित हुआ ।
✔️ सन् 1878 में इनके काल में रामप्रकाश थियेटर (Ramprakash Theater) की स्थापना हुई । सन् 1876 में प्रिन्स ऑफ वेल्स (Prince of wales) ने जयपुर की यात्रा की इनकी स्मृति में इन्होने अलबर्ट हॉल (Albert Hall) का निर्माण करवाया ।
महाराजा माधोसिंह द्वितीय (1880 से 1922 तक) (Maharaja Madhosingh II)
✔️ सवाई रामसिंह द्वितीय की निःसंतान मृत्यु होने के उपरान्त उनका दत्तक पुत्र माधोसिंह द्वितीय गद्दी पर बैठा ।
✔️ सन् 1902 में माधोसिंह द्वितीय ब्रिटीश सम्राट के समारोह में शामिल होने के लिये इग्लैण्ड पहुंचे थे । इन्होने मदन मोहन मालवीय को जयपुर आने पर बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय (Banaras Hindu University) के लिए पाँच लाख रूपये प्रदान किये थे ।

मानसिंह द्वितीय (Mansingh Second)

✔️ माधोंसिह द्वितीय की मृत्यु के बाद इनके दत्तक पुत्र मानसिह द्वितीय गद्दी पर बैठे ये स्वतन्त्रता प्राप्ति तक शासक रहे ।
✔️ 30 मार्च 1949 को वृहद् राजस्थान के गठन के बाद इन्हे प्रथम राजप्रमुख बनाया गया तथा 1 नवम्बर 1956 तक इन्होने इस पद पर कार्य किया ।
नोट :- मिर्जा इस्माइल (Mirza Ismail) को जयपुर का निर्माता कहा जाता है । ये मानसिह द्वितीय के प्रधानमत्री थे । इन्होने चार दीवारों के बाहर जयपुर को सुनियोजित ढ़ग से बसाया ।

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