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Green Revolution Components & Impact

हरित क्रांति घटक और प्रभाव-
(Green Revolution Components & Impact)
हरित क्रांति के बारे में जानकारी
हरित क्रांति परिभाषा-
(Green Revolution Defination)
👉 1960 के दशक के आरम्भिक चरण में कृषि में कुछ नए तकनीकों की शुरुआत की गई, जो विश्वभर में हरित क्रांति के नाम से प्रसिद्ध हुई।

👉 इन तकनीकों का प्रयोग पहले गेहूँ की खेती के लिए तथा दूसरे दशक में धान की खेती के लिए किया गया।

👉 इन तकनीकों के द्वारा खाद्यान्न उत्पादन में क्रांति आई तथा उत्पादकता स्तर 250 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ गया।

👉 1800 के दशक में हरित क्रांति के पीछे सबसे बड़ा हाथ जर्मन कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलॉग का था, जो 1960 के दशक के शुरुआत में मैक्सिको में ब्रिटिश रॉकफेलोर फॉउंडेशन स्कॉलरशिप पर अनुसंधान कर रहे थे।

👉 25 June Current Affairs Questions #132

👉 बोरलॉग द्वारा विकसित उन्नत किस्म के गेहूँ के बीजों के द्वारा उत्पादकता 200 प्रतिशत से अधिक बढ़ गई।

👉 1965 तक इन बीजों का सफलतापूर्वक परीक्षण कर लिया गया तथा खाद्यान्न अभाव वाले देश, जैसे-मैक्सिको, ताइवान आदि में किसानों द्वारा इनका प्रयोग किया जाने लगा।

हरित क्रांति के घटक
(Components of Green Revolution)

👉 हरित क्रांति कई आगत/घटक के पर्याप्त आपूर्ति पर आधारित था। हरित क्रांति के मुख्य घटक निम्नलिखित हैं:

1. उन्नत किस्म के बीज (High Yielding Varieties of seeds)

➥ लोकप्रिय रूप से इन्हें बीजों की ‘बौनी’ (dwarf) किस्म कहा जाता है।

➥ बार-बार उत्परिवर्तन की मदद से बोरलॉग ने बीजों की उन किस्मों को विकसित किया जिन्हें पौधे के अन्य भागों की अपेक्षा अधिक पोषक तत्व प्राप्त होते हैं।

➥ इस कारण से ये पौधे छोटे होते थे, लेकिन इनमें दोनों का आकार बड़ा होता था।

➥ ये बीज प्रकाश संश्लेषण रहित (non-photo synthetic) थे अर्थात् अपनी उपज के लिए वे सूर्य की किरणों पर निर्भर नहीं थे।

2. रासायनिक उर्वरक (Chemical Fertilizers)

➥ HYV बीज (hyv seeds) उत्पादकता तभी बढ़ा सकते थे, जब इन्हें उचित मात्रा में पोषक तत्व मिले।

➥ इन बीजों के लिए परंपरागत वानस्पतिक खाद पर्याप्त नहीं थी क्योंकि उनमें पोषक तत्वों की मात्रा कम होती थी।

➥ यहाँ परंपरागत उर्वरकों की जगह अधिक उर्वरकों की आवश्यकता थी और इस तरह नाइट्रोजन (N), फॉस्फेट (P) तथा पोटाश (K) की समुचित आपूर्ति आवश्यक हुई।

रासायनिक उर्वरक उदाहरण (Chemical Fertilizers Example)- organic fertilizer, urea fertilizer, DAP fertilizer, RFCL, bio fertilizer, MOP fertilizer, calcium nitrate fertilizer

3. सिंचाई (Irrigation)

➥ उर्वरकों को घोलने तथा फसलों के नियंत्रित विकास के लिए समयानुसार सिंचाई की आवश्यकता होती है।

➥ सिंचाई के दौरान इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि फसल क्षेत्र बाढ़ रहित रहे तथा कृत्रिम जलापूर्ति की व्यवस्था का विकास भी हो।

4. रासायनिक कीटनाशक तथा जीवाणुनाशी
(Chemical Pesticides and Germicides)

➥ नए बीज वर्तमान देशज किस्मों की अपेक्षा स्थानीय कीड़ों तथा बीमारियों से कम सुरक्षित थे। इसलिए कीटनाशक तथा जीवाणुनाशी का उपयोग सुनिश्चित उपज के लिए आवश्यक था।

5. रासायनिक खरपतवारनाशक तथा अपतृणनाशक
(Chemical Herbicides and Weedicides)

➥ इनका उपयोग इसलिए आवश्यक है क्योंकि, महँगे उर्वरकों की खरपतवार तथा अपतृ खपत न कर सकें।

6. साख, भंडारण, विपणन और वितरण
( Credit, Storage, Marketing and Distribution )

➥ किसान हरित क्रांति के महँगे आगत का उपयोग कर सकें इसलिए उन्हें सस्ते ऋण की आवश्यकता थी।

➥ जिन क्षेत्रों को इस नए किस्म की कृषि के अन्तर्गत लाया गया (जैसे-भारत में हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश) वहाँ वितरण से पूर्व भंडारण की भी व्यवस्था की गई।

➥ जिन देशों ने हरित क्राति को अपनाया वहाँ खाद्यान्न की कमी थी तथा वहाँ यह आवश्यक था कि नई उपज का वितरण पूरे देश में किया जाए जिसके लिए विपणन, वितरण तथा समूचित परिवहन व्यवस्था जरूरी थी।

➥ इस आधारभूत संरचना को विकसित करने के लिए विश्व बैंक से कम ब्याज पर ऋण भी उपलब्ध कराए गए, जिसका भारत सबसे बड़ा लाभार्थी था।

हरित क्रांति के प्रभाव
(Impact of the Green Revolution)

👉 हरित क्रांति के विश्व के देशों पर सकारात्मक एवं नकारात्मक सामाजिक – आर्थिक तथा पारिस्थितिकीय प्रभाव पड़े, यहाँ हम विशेषकर भारत पर पड़े प्रभावों की चर्चा करेंगे:

1. सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
( Socio-economic Impact)

➥ खाद्यान्न के उत्पादन में वृद्धि हुई (1960 के दशक में गेहूँ के उत्पादन तथा 1970 के दशक में चावल के उत्पादन में) तथा कई देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो गए (खाद्यान्न की आत्मनिर्भरता तथा खाद्य सुरक्षा में स्पष्ट अंतर है), तो कुछ खाद्यान्न निर्यातक देश भी बन गए।

➥ हरित क्रांति के कारण किसानों की आय में विसंगति आई, जिसके फलस्वरूप भारत में अन्तर-वैयक्तिक (Inter-personal) तथा अंतर-क्षेत्रीय (Inter- regional) असमानता बढ़ी।

➥ इसके कुछ अन्य नकारात्मक प्रभाव भी थे, जैसे-जलजमाव के कारण मलेरिया से पीड़ित लोगों की संख्या में वृद्धि तथा असंतुलित फसल प्रतिरूप (दलहन, तिलहन, मक्का, जौ, इत्यादि की जगह गेहूँ तथा धान का अधिक उत्पादन)।

2. पारिस्थितिकीय प्रभाव
(Ecological Impact)

➥ यह हरित क्रांति का सबसे विध्वंसकारी प्रभाव है।

➥ जब इससे जुड़े हुए मामलों को मीडिया, विद्वानों, विशेषज्ञों तथा पर्यावरणवादियों द्वारा उठाया गया तो न तो सरकार और न ही जनता पर इसका कोई असर हुआ (किसानों में शिक्षा की कमी थी इसलिए वे हरित क्रांति के दुष्प्रभावों को समझ नहीं पाए),

➥ लेकिन धीरे-धीरे सरकार तथा सरकारी ऐजेन्सियों ने पारिस्थितिकीय एवं पर्यावरण-संबंधी मुद्दों का अध्ययन एवं सर्वेक्षण शुरू किया।

इनमें से मुख्य मुद्दे निम्नलिखित हैं:-

(i) गंभीर पारिस्थितिकीय संकट ( Critical Ecological Crisis): अध्ययनों4 के आधार पर यह पाया गया कि हरित क्रांति के प्रदेश नाजुक पारिस्थितिकीय संकट से घिरे हुए हैं जो निम्नलिखित तथ्यों से प्रमाणित हो रहे हैं:

(a) निम्नीकृत मृदा उर्वरताः पुनावृत्तिजनक (repetitive) फसल पद्धति के कारण हरित क्रान्ति के प्रदेशों में भूमि की उत्पादक क्षमता का ह्रास जारी था। उपयुक्त फसल प्रतिरूप की कमी के कारण मृदा उर्वरता घटती जा रही थी।

(b) हरित क्रांति के प्रदेशों में जल स्तर (Water Table) तीव्र गति से घटता जा रहा था क्योंकि परंपरागत बीजों की तुलना में HYV बीज सिंचाई के लिए कई गुना अधिक जल का प्रयोग करते हैं – 1 किलो चावल के उत्पादन के लिए 5 टन जल की आवश्यकता होती है।

(c) रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों एवं खरपतवारनाशकों के अत्यधिक उपयोग के कारण पर्यावरण तेज गति से प्रदूषित हो रहा है। भारत में इसका मुख्य कारण वेनोन्मूलन तथा कृषि का पारिस्थितिकीय रूप से कमजोर क्षेत्रों में विस्तार है। इसके अतिरिक्त पशुओं का भी वन क्षेत्रों पर अत्यधिक दबाव है, मुख्य रूप से बकरियों तथा भेड़ों का।

(ii) खाद्य श्रृंखला में विष का स्तर (Toxic level in food chain):

➥ भारत की खाद्य श्रृंखला में विष का स्तर अधिक हो गया है तथा यहाँ उत्पादित कोई भी खाद्य-सामग्री मानव उपभोग के लायक नहीं रही है।

➥ दरअसल रासायनिक कीटनाशकों तथा घास-पातनाशकों का अनियंत्रित उपयोग अधिक हो गया है।

➥ इनके उपयोग तथा औद्योगिक उत्पादन के कारण भूमि, जल – तथा वायु प्रदूषण में वृद्धि हुई है तथा पूरी खाद्य श्रृंखला में अधिक विषाक्तता फैल गई है।

👉 निष्कर्ष
(Conclusion)

➥ ऊपर के अध्ययन पारिस्थितिकीय रूप से अस्थाई कृषि प्रकार को लेकर आंखें खोलने वाले तो हैं ही साथ ही इस पर सवाल भी उठाते हैं।

➥ यह ऐसा समय था जब कृषि-वैज्ञानिक सचमुच ‘हरी’ (पर्यावरण-अनुकूल) हरित क्रांति की सलाह दे रहे थे, जिसे आज विशेषज्ञ और भी कई नामों से जानते हैं- सदाबहार क्रांति, दूसरी हरित क्रांति, हरित कृषि।

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