FARM INDEBTEDNESS AND AGRIPOLICY

किसान आत्महत्या पर निबंध
Essay on farmer suicide in hindi

Agricultural indebtedness and agricultural policy
FARM INDEBTEDNESS AND AGRIPOLICY

कृषि ऋणग्रस्तता एवं कृषि नीति
(Agricultural indebtedness and agricultural policy)

परिचय (Introduction):-
new agriculture policy meaning in Hindi :-

काश्तकार या खेतिहर समुदाय की ऋणग्रस्तता हमेशा से सरकार के लिए एक बड़ी चिंता का विषय रही है।

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जब किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं की संख्या खतरनाक स्तर तक बढ़ी, फिर समुदाय के बीच ऋणग्रस्तता एक बार फिर से आमजनों के लिए सार्वजनिक बहस का मुद्दा बनकर सामने आ गया है।

आज जबकि ऋणग्रस्तता को किसानों द्वारा आत्महत्या करने के सबसे बड़े कारण के रूप में देखा जाता है, कृषि क्षेत्र के संबंध में सरकार की नीतियों के पुनर्मूल्यांकन एवं कृषि नीति के ढांचे को पुनर्गठित करने की आवश्यकता दिखायी देती है।

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किसानों की ऋणग्रस्तता (Farm Indebtedness):-
Farm indebtedness meaning in Hindi :-

  1. किसानों द्वारा आत्महत्या के लिए ऋणग्रस्तता एवं बैंक से लिया गया कर्ज नहीं लौटा पाने की असमर्थता को एक बड़े कारण के रूप में उल्लिखित किया जाता रहा है।
  2. किसानों के द्वारा की गई 37 प्रतिशत आत्महत्याएं कर्ज में फंसे होने की वजह से की गईं।
  3. आमतौर पर सूद पर कर्ज उपलब्ध कराने वाले स्थानीय महाजन का चित्रण इसमें खलनायक के तौर पर किया गया है,
  4. लेकिन राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो-एनसीआरबी) के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2015 में आत्महत्या करने वाले किसानों के 80 प्रतिशत मामलों में किसान ने ऋण प्रदान करने वाले संस्थागत स्रोतों (बैंक एवं पंजीकृत माइक्रो फाइनेंस संस्थान) से कर्ज लिया था।
  5. इसके अलावा, देश किसानों द्वारा आत्महत्या की दर में तीन गुनी वृद्धि (वर्ष 2014 में 1163 आत्महत्या के विरुद्ध वर्ष 2015 में 3097) का साक्षी रहा है।
  6. वर्ष 2015 में कुल 8007 किसान अलग-अलग कारणों से आत्महत्या करने को मजबूर हुए।
  7. इस साल पहली बार राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो ने ऋण के स्रोतों के आधार पर कर्ज या ऋण न चुका पाने की असमर्थता के कारण होने वाली किसानों की आत्महत्या को वर्गीकृत किया।
  8. कुछ इसी तरह के निष्कर्ष एनएसएसओ की नवीनतम रिपोर्ट ‘भारत में खेतिहर घरों के स्थिति आकलन सर्वेक्षण’ से भी आए हैं।
  9. रिपोर्ट में कहा गया है कि, भारत में करीब 52 फीसदी खेतिहार परिवार कर्जदार (ऋणाग्रस्त) हैं और रिपोर्ट के मुताबिक, कर्ज का स्तर आंध्र प्रदेश में 93 फीसदी और तेलंगाना में 89 फीसदी है।

कृषि आत्महत्याओं के बारे में बदली हुई समझ कम-से-कम एक चीज स्पष्ट करती है

और वह यह कि कृषि ऋण के विस्तार के लिए और अधिक धनराशि का आवंटन ही पर्याप्त उपाय नहीं है।

किसानों की आमदनी (agricultural income):-
Types of agricultural income :-

  1. एनएसएसओ की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक, देश में किसानों की आमदनी की स्थिति अभी भी दयनीय ही है।
  2. एक खेतिहर परिवार को इस प्रकार परिभाषित किया गया है- वह परिवार जिसका कम-से-कम एक सदस्य कृषि कार्यों में स्वयं नियोजित हो एवं उस परिवार में कृषि से 3000 रुपये से अधिक मूल्य के कृषि उत्पाद की प्राप्ति हो रही हो। 
  3. यह बड़े हैरत की बात है कि इस रिपोर्ट के मुताबिक, 56% सीमांत जमीन वाले परिवारों (0.01 हेक्टेयर से कम भूमि) की आमदनी का मुख्य जरिया मजदूरी और वेतन रोजगार है न कि कृषि। 
  4. अन्य 23 प्रतिशत परिवारों की आय का प्रमुख स्रोत इस रिपोर्ट में पशुधन को बताया गया है। 
  5. प्रति खेतिहर परिवार औसत मासिक आय 6,426 रुपये होने का अनुमान लगाया गया है जबकि प्रति खेतिहर परिवार कृषि व्यवसाय से शुद्ध प्राप्ति (खेती एवं मवेशी पालन) औसत मासिक आय का 60 प्रतिशत बताई गई है। 
  6. वहीं मजदूरी एवं वेतन से होने वाली आमदनी औसत मासिक आय का 32 प्रतिशत होने की बात कही गई है। 
  7. देश में अनुमानित खेतिहर परिवारों में से करीब 44 प्रतिशत परिवारों में रोजगार गारंटी योजना या मनरेगा जॉब कार्ड था।
  8. हालांकि, सबसे निम्न भूमि श्रेणी (0.01 हेक्टेयर से कम) में जॉब कार्ड केवल 38 प्रतिशत परिवारों में था।
  9. इसके अलावा, खेतिहर परिवारों के 12 प्रतिशत में और सीमान्त भूमि वाले 13 प्रतिशत परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं था, जो उन्हें सब्सिडीयुक्त खाद्यान्न के लिए पात्र बनाता।
संस्थागत और गैर-संस्थागत ऋण
(Institutional and Non-Institutional Loans)

agriculture loan, farm loans, crop loan, tractor loan, dairy farm loan etc.  लेने से किसानों के बढ़ते संकट पर कुछ तथ्य :-

अब तक यह धारणा थी कि गैर-कृषि कारकों को छोड़कर वास्तव में कृषि संकट के कारण किसानों को आत्महत्या करनी पड़ती थी।
हां तक कि अगर कुछ आत्महत्याएं ऋणग्रस्तता की वजह से हुईं भी तो यह स्थानीय कर्जदाता महाजनों, जिन पर किसान कर्ज के रूप में आर्थिक सहयोग के लिए अत्यधिक निर्भर रहा करते हैं, की ऊंची ब्याज दरों और शोषणपूर्ण व्यवहार के कारण था। 
आधिकारिक तौर पर यह महसूस किया गया था कि एक बार संस्थागत ऋण देने की व्यवस्था चाक-चौबंद हो जाती है तो इस समस्या का सही निराकरण भी हो जाएगा। 
लेकिन नवीनतम आंकड़ों से पूरी तरह से अलग कहानी बयां होती है।
बहुसंख्यक किसान, जो आत्महत्या करने को मजबूर हुए, उन्होंने संस्थागत स्रोतों से ऋण लिए थे। इसे निम्नलिखित तरीके से समझा जा सकता है:-

  1. संस्थागत स्रोतों में, माइक्रो-फाइनेंस ऐजेंसियां हाल के वर्षों में बहुत तेजी से फैली हैं। सरकार उन्हें सामान्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय समावेश को बढ़ावा देने और विशेष रूप से कृषि समुदाय को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उदारीकृत नीतिगत माहौल प्रदान करती है। 
  2. हालांकि माइक्रो-फाइनेंस ऐजेंसियां आसानी से सुलभ हैं, लेकिन स्थानीय महाजनों की तुलना में उनकी ब्याज दरें भी कम शोषक नहीं हैं। 
  3. इसके अलावा, इन ऐजेंसियों की ऋण वसूली पद्धति में एक ‘मानवीय संवेदना’ का अभाव है, जो स्थानीय महाजनों के मामले में देखने को मिलता है। 
  4. ऐसा समान समाज या गांव से ताल्लुक रखने की उनकी भावना की वजह से होता है। 
  5. सामान्य बैंक की भी बात करें तो उनकी स्थिति तब तक कोई बहुत अच्छी नहीं है जब तक कि वहां ब्याज में कोई रियायत नहीं बरती जा रही हो। 
  6. फसल नुकसान होने या फिर किसी अन्य कारणों से किसानों के सामने ऋण का भुगतान करने और यहां तक कि जीवन को बनाए रखने का कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है। 
  7. किसी अन्य वित्तीय समर्थन व्यवस्था के अभाव की स्थिति में ऐसे किसानों के आत्ममहत्या कर लेने की आशंका अत्यधिक प्रबल रहती है।

संभावित निदान (Possible Remedies)

वर्तमान स्थिति को देखते हुए, कृषि ऋण के लिए धन का अत्यधिक आवंटन अपने उद्देश्यों को पूरा करता नहीं दिखाई दे रहा है

इससे जहां एक तरफ सरकारी खजाने पर वित्तीय बोझ बढ़ रहा है वहीं दूसरी तरफ इससे किसान दिवालिया होने और कर्ज के कुचक्र में फंसने से भी वास्तविक अर्थों में नहीं बच पाए हैं।

परिवर्तित परिदृश्य में, संकट को संभालने के लिए निम्नलिखित कदम अधिक उपयुक्त प्रतीत होते हैं :-

  1. औपचारिक / संस्थागत ऋण देने (जिसमें विगत एक दशक के दौरान चार गुना वृद्धि हुई है) पर जोर देने के अलावा, कृषि समुदाय के लिए ‘पूरक आय’ सहायता प्रणाली को स्थापित करने की आवश्यकता है।
  2. मानसून और जलवायु से संबंधित परिवर्तनशीलता को देखते हुए, यह और भी अधिक उपयुक्त दिखता है ज्यादातर कमजोर और सीमांत किसान ऋण के संस्थागत स्रोतों से लाभ उठाने में नाकाम रहे हैं। 
  3. इसका समाधान प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए। न्यूनतम समर्थन मूल्य संचालन को सभी कमजोर किसानों को समाहित करने में सक्षम होना चाहिए। 
  4. किसानों के लिए आय के अतिरिक्त स्रोत बनाने के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए, ‘कौशल संवर्द्धन’ की मौजूदा योजना के साथ स्थानीय स्तर पर कृषि प्रसंस्करण उद्योगों को बढ़ावा देने की भी आवश्यकता है। 
  5. ‘स्मार्ट शहरों’ की योजना को किसानों से प्राथमिकता के आधार पर जोड़ा जाना चाहिए। 
  6. डेयरी, कुक्कुट पालन, मत्स्य-पालन आदि जैसी कृषि संबद्ध गतिविधियों को एक लक्षित तरीके से बढ़ावा दिया जाना चाहिए। 
  7. किसानों के बीच कृषि बीमा के बारे में जागरूकता उच्च प्राथमिकता के साथ बढ़ाया जाना चाहिए। 
  8. बैंकों और सूक्ष्म-वित्त पोषण संस्थानों के कार्यों की सभी संभव नजरिए से स्थानीय स्तर पर भी निगरानी की जानी चाहिए। 
  9. एनएसएसओ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, एक बार यूबीआई (सार्वभौमिक बुनियादी आय) का प्रस्तावित विचार पर अमल शुरू होने भर की देर है, 
  10. छोटे और सीमांत किसानों को इसमें सबसे पहले जगह मिल जाने की उम्मीद की जानी चाहिए (यदि यह सार्वभौमिक रूप से शुरू नहीं किया गया है, जैसा कि भारत सरकार ने संकेत दिया है)। 
  11. सामान्य तौर पर, ‘कृषि की परेशानियों/संकट’ के कारणों का पुनर्परीक्षण किया जाना चाहिए और प्राथमिकता के आधार पर उपयुक्त नीतिगत कार्रवाई के साथ इसके समाधान की दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए। 
  12. कृषि क्षेत्र के लिए अपेक्षाकृत अधिक समग्र नीतिगत ढांचा आज की आवश्यकता है।

निष्कर्ष (Conclusion):-
conclusion on Indian agriculture :-

नवीनतम रिपोर्ट हमें यह बताती है कि पिछले एक दशक में किसानों के लिए परिस्थितियां थोड़ी बदल-सी गई हैं-

(विगत एक दशक के दौरान किसानों की आत्महत्याओं के मामले हरित क्रांति के परंपरागत क्षेत्रों में भी देखने को मिल रहे हैं, जहां के किसानों को अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध और आर्थिक रूप से अधिक सुरक्षित माना गया है)

इससे स्पष्टतः यह साबित होता है कि कृषि क्षेत्र, जिस पर आधा देश निर्भर है, अभी भी सरकारी नीतियों के ध्यान संकेद्रण से बाहर है।

हालांकि, पिछले दो सालों में हमने भारत सरकार को खेती के क्षेत्र पर अधिक ध्यान देते हुए देखा है।

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