दिल्ली सल्तनत और रणथम्भौर (Delhi Sultanate and Ranthambore)

 दिल्ली सल्तनत और रणथम्भौर
(Delhi Sultanate and Ranthambore)

दिल्ली-सल्तनत-और-रणथम्भौर
दिल्ली-सल्तनत-और-रणथम्भौर

✔️ सन् 1191 के तराईन के प्रथम युद्ध में अजमेर का चौहान शासक पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने मोहम्मद गौरी को पराजित किया, किन्तु एक वर्ष बाद ही 1192 के तराईन के द्वितीय युद्ध में मोहम्मद गौरी की विजय हुई। मोहम्मद गौरी की इस विजय ने भारत का इतिहास ही बदल दिया ।
✔️ तराईन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को मिली पराजय का परिणाम था कि 1947 तक भारत कई विदेशी शक्तियों के अधीन रहा ।
नोट :- वर्तमान में तराईन नामक स्थान हरियाणा प्रान्त के करनाल जिले में स्थित है ।
✔️ पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविन्दराज ने रणथम्भौर के चौहान वंश की नीव रखी ।
✔️ मोहम्मद गौरी ने अपने दास कुतुबुद्दीन ऐबक को रणथम्भौर का प्रशासक नियुक्त किया ।
✔️ गोविन्दराज का पुत्र वल्हण भी दिल्ली सल्तनत को उचित रूप से कर भेजता रहा । अतः इस समय तक रणथम्भौर शासकों के दिल्ली सल्तनत के साथ अच्छे सम्बन्ध रहे ।
✔️ सन् 1226 में इल्तुतमिश ने रणथम्भोर पर असफल आक्रमण किया ।

✔️ सन् 1236 में इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद उसका पुत्र रूकुनुद्दीन फिरोज उत्तराधिकारी हुआ जो कि अयोग्य एवं दुर्बल शासक था ।

✔️ रणथम्भौर दुर्ग में बाघ भट्ट ने इस दुर्ग का घेरा डाला । इल्तुतमिश की पुत्री रजिया बेगम ने हसन गौरी को रणथम्भोर दुर्ग के विरूद्ध भेजा ।
✔️ सन् 1248 में नासिरूद्दीन महमुद के प्रधानमंत्री बलबन ने इस दुर्ग पर असफल आक्रमण किया । इस दौरान तुर्क सेनापति बहाउद्दीन मारा गया । सन् 1253-54 में बलबन ने पुनः इस दुर्ग पर आक्रमण किया ।

हम्मीर और दिल्ली सल्तनत

✔️ हम्मीर जैत्र सिंह (जय सिंम्हा) का तीसरा व योग्य पुत्र था । हम्मीर की माता का नाम हीरा देवी था । हम्मीर अपने पिता की मृत्यु के बाद 1282 में रणथम्भौर का शासक बना । हम्मीर का शासन काल 1282 से 1301 तक है।
✔️ आरम्भ में हम्मीर ने दिग्विजय की नीति को अपनाया, तथा उसने 1288 तक रणथम्भौर दुर्ग की सीमाओं का पर्याप्त विस्तार कर लिया । इस उपलक्ष्य में इसने कोटियजन यज्ञ का आयोजन करवाया, जिसका राजपुरोहित पण्डित विश्वरूप था ।

जलालुद्दीन खिलजी और हम्मीर

✔️ सन् 1290 में खिलजी वंश के संस्थापक जलालुद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर दुर्ग पर आक्रमण किया । इस दौरान हम्मीर का सेनापति गुरूदास सैनी मारा गया ।
✔️ जलालुद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर दुर्ग के पास स्थित झाइन दुर्ग पर अधिकार कर लिया जिसे वर्तमान में छान या छाण कहा जाता है
✔️ इस विजय से उत्साहित होकर जलालुद्दीन ने रणथम्भौर दुर्ग का घेरा डाला लेकिन दुर्ग पर अधिकार करने में असफल रहा । अन्त में 1291 में दिल्ली लोट आया ।
नोट :- जलालुद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर दुर्ग के बारे में कहा था “ऐसे 10 दुर्गो को भी मैं मुसलमानों के एक बाल के बराबर नही समझता’

अल्लाउद्दीन खिलजी और हम्मीर

✔️ सन् 1296 मे अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बना । ✔️ सन् 1299 में जब अल्लाउद्दीन खिलजी की सेनाए गुजरात विजय से लोट रही थी, तो जालौर की सीमा पर मंगोल सैनिकों ने धन के बँटवारे को लेकर विद्रोह कर दिया तथा मंगोल सैनिक मोहम्मद शाह व कैब्रू रणथम्भौर शासक हम्मीर की शरण में चले गये ।
✔️ जब अल्लाउद्दीन खिलजी ने हम्मीर देव चौहान से सैनिक मोहम्मद शाह व कैब्रू को लौटाने को कहा तो हम्मीर ने इन्हे लौटाने से इनकार कर दिया । अतः अल्लाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर दुर्ग पर आक्रमण किया ।
✔️ सन् 1299 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने नुसरत खाँ, उलगु खाँ तथा अल्प खाँ के नेतृत्व में हम्मीर के विरूद्ध सेनाएँ भेजी । इनका मुकाबला करने हेतु हम्मीर देव चौहान ने अपने सेनापति धरम सिंह तथा भीम सिंह को भेजा । यहां खिलजी सेनाएँ पराजित हुई ।
✔️ इस विजय से उत्साहित धरम सिंह लुट का माल लेकर दुर्ग की ओर लौटा जबकि भीम सिंह विजय की खुशी में धीरे-धीरे लौट रहा था ऐसे समय में उलगु खाँ ने घात लगा कर भीम सिंह की हत्या कर दी । इस दौरान अल्लाउद्दीन खिलजी का सेनापति नुसरत खाँ भी मारा गया ।
✔️ नुसरत खाँ की मृत्यु तथा उलगु खाँ की पराजय का समाचार अल्लाउद्दीन खिलजी के पास पहुचा तों स्वयं एक विशाल सेना लेकर रणथम्भौर दुर्ग की ओर बढ़ा, तथा बनास नदी के तट पर अपना शिविर लगाया ।
✔️ लगभग एक साल के घेरे के उपरान्त भी अल्लाउद्दीन खिलजी इस दुर्ग पर अधिकार करने में असफल रहा अतः इसने कुटनीति का सहारा लिया । ✔️ अल्लाउद्दीन खिलजी ने हम्मीर देव के दो सेनानायक रणमल तथा रत्तीपाल को विजय के उपरान्त रणथम्भोर दुर्ग का प्रलोभन देकर अपनी ओर मिला लिया । इन दोनों के विश्वासघात से अल्लाउद्दीन खिलजी की सेनाएँ दुर्ग में प्रवेश कर गई, तथा दुर्ग में खाद्य सामग्री का अभाव हो गया।
नोट :- अमीर खुसरो इस समय अल्लाउद्दीन खिलजी के साथ उपस्थित था, उसने लिखा है कि सोने के दो दानों के बदले में चावल का एक भी दाना नसीब नही हो रहा था
✔️ 11 जुलाई 1301 को रणथम्भौर दुर्ग पर अल्लाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो गया ।
✔️ हम्मीर अपने सैनिकों के साथ युद्धभूमि में लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ तथा राजपूत ललनाओं ने अपनी परम्परागत विधि का निर्वाह किया तथा जौहर किया ।

नोट :- रणथम्भौर दुर्ग को राजस्थान के इतिहास का प्रथम साका या जौहर माना जाता है । हम्मीर देव की पत्नी रानी रंगादेवी ने जल में कुद कर अपने प्राण दिये बाद में जल से निकाल कर अग्नि दी गई । यह राजस्थान के इतिहास का एकमात्र जल जौहर है ।
✔️ इस दौरान हम्मीर की पुत्री देवल देवी ने भी जौहर किया । “देवलदो रो आत्मसर्ग” की घटना इसी से जुड़ी हुई है।
✔️ हम्मीर शिव का उपासक था जिसे अपनी हठधर्मिता के लिये जाना जाता है । हम्मीर के लिये कहा जाता है कि “तिरिया तेल हम्मीर हठ चढ़े न दूजी बार”
✔️ रणथम्भोर दुर्ग पर अल्लाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो जाने के उपरान्त अमीर खुसरो ने लिखा है कि “क्रुफ का गढ़ इस्लाम का घर हो गया है”

हम्मीर तथा साहित्य

✔️ हम्मीर रासों महाकाव्य – नयन चन्द्र सूरी
✔️ हम्मीर रासो – जोधराज
✔️ हम्मीर रासौ – सारंगधर
✔️ हम्मीर हठ और सुर्जन चरित्र – चन्द्रशेखर
नोट :- बीजीदित्य नामक कवि ने हम्मीर के दरबार में ही आश्रय पाया था ।



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