Define Demographic Dividend

Demographic dividend upsc-
जनसांख्यिकीय लाभांश

👉 जनसांख्यिकीय विभाजन क्या है?
     (demographic dividend meaning in hindi?)

परिचय (Introduction):-

विशेषज्ञ और अंतर्राष्ट्रीय संस्थान दोनों ही लगातार ये बात कह रहे हैं कि अब भारत की इसके जनसांख्यिकीय लाभांश का फायदा उठाने की बारी है।

इस चर्चा के चरम पर आर्थिक सर्वेक्षण 2012-13 द्वारा एक इस विषय पर एक अलग अध्याय प्रकाशित किया गया है।

चूंकि भारत की निर्भरता का अनुपात तेजी से गिर रहा है, भारत जल्द ही अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का आनंद लेने के शीर्ष पर पहुंच जाएगा।

कार्यशील जनसंख्या (डब्ल्यू ए) की शीर्ष स्थिति का अर्थव्यवस्था में सबसे ऊंचा योगदान।

यह ध्यान में रखना चाहिए कि जनसंख्या संभावित मौके उपलब्ध कराती है और यह नियति नहीं है (जैसे कि आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 और 2015-16 याद दिलाते हैं)।

भारत को यह समय अपने कई बड़े आर्थिक अंतर को भरने में ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने की आवश्यकता है जिसका सामना वह कई दशकों से कर रहा है।

हालिया अध्ययन दर्शाते हैं कि भारत इस समय अलग स्थिति में है- जनसांख्यिकीय लाभांश के मौके के आने का इंतजार करने के समय से और जल्द ही भारत इस स्थिति को पीछे छोड़ते हुए भी देखेगा- यह मौका बिल्कुल भी नहीं चूकना चाहिए।

संक्रांति काल

वैश्विक जनसांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार 2016 में बदलाव का समय दिखा था- 1950 के बाद से पहली बार, अग्रिम देशों की संयुक्त डब्ल्यूए जनसंख्या (15-59 वर्षों के आयु वर्ग वाली) गिर रही है।

यूएनओ के अनुमानों के मुताबिक, अगले तीन दशकों के लिए चीन और रूस अपने डब्ल्यूए को 20 फीसदी से अधिक गिरता हुआ देखेंगे,

जबकि भारत अपनी डब्ल्यूए आबादी के साथ जनसांख्यिकीय रूप से फायदे की स्थिति में दिखता है-

इसी अवधि में एक तिहाई बढ़ने की संभावना व्यक्त की गई है।

पिछले दो दशकों के आर्थिक शोध बताते हैं कि पूर्वी एशिया में ऊंची वृद्धि दर जनसांख्यिकीय बदलावों द्वारा आयी।

अधिक डब्ल्यूए जनसंख्या वाले देश अधिक लाभ वाली स्थिति में दिखाई पड़ते हैं क्योंकि युवा जनसंख्याः-

  • अधिक उद्यमशील होती है (उत्पादन क्षमता में वृद्धि को जोड़ते हुए);
  • अधिक बचत करने वाला वह वर्ग प्रतियोगितात्मक प्रभाव की अगुवाई कर सकती है, और;
  • वृद्धि की वजह से, उनके पास बड़ा राजकोषीय आधार है, निर्भर रहने वालों की कम संख्या और मदद के लिए सरकार।

सैद्धांतिक आधार पर माना जाता है कि जनसांख्यिकीय लाभांश में लाने वाला विशिष्ट कारक, गैर-कार्यशील आबादी (एनडब्ल्यूए) की तुलना में कार्यशील आबादी का अनुपात है.

Why is demographic dividend important?

भारत के जनसांख्यिकीय आंकड़े
(India’s Demographics)

भारत की विशिष्टताः-

➥ भारत, ब्राजील, कोरिया और चीन के लिए 1970 और 2015 के बीच डब्ल्यूए/एनडब्ल्यूए के अनुपात की तुलना (यूएनओ के अनुमानों पर आधारित) भारत की जनसांख्यिकीय प्रोफाइल के बारे में तीन विभिन्न विशेषताएं दर्शाती है, जिनका भारत और इसके राज्यों की वृद्धि की संभावनाओं पर असर पड़ता है:-
  1. दूसरे देशों की तुलना में भारत का जनसांख्यिकीय चक्र करीब 10-30 वर्ष पीछे है। इससे पता लगता है कि भारत के पास अगले कुछ दशकों में तीनों देशों के प्रति व्यक्ति आय के स्तर तक पहुंचने का मौका है।
  2. भारत का डब्ल्यूए और एनडब्ल्यूए अनुपात अधिकतम 1.7 पर रह सकता है, ब्राजील और चीन की तुलना में कहीं कम, इन दोनों में ही 1.7 से अधिक का अनुपात कम-से-कम 25 वर्ष तक रहा।
  3. दूसरे देशों की तुलना में भारत अपने डब्ल्यूए और एनडब्ल्यूए के अधिकतम अनुपात के आस-पास कहीं अधिक समय के लिए बना रहेगा।

➡️ भारत के ‘विशिष्ट’ जनसांख्यिकीय ढांचे का एक कारण भी है और इसके असर भी हैं:-

कारणः इन सभी देशों में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का समय लगभग एक समान, बहुत अधिक कुल प्रजनन दर (टीएफआर) के साथ शुरू हुआ था।

चीन और कोरिया में, टीएफआर तब तेजी से निम्न जनसंख्या स्तर (एक स्त्री पर दो से कम बच्चे) के नीचे गिरी, जिसकी वजह से 2000 की शुरुआत तक डब्ल्यूए जनसंख्या वाला हिस्सा बढ़ा,

इसके बाद जब बढ़ती उम्र वाली जनसंख्या का दौर आने लगा तो ये गिरनी शुरू हुई।

हालांकि भारत में टीएफआर में गिरावट कहीं अधिक नियमित रही।

परिणामः जनसांख्यिकीय लाभांश के चलते पूर्वी एशियाई देशों ने जिस बड़े पैमाने पर तरक्की को अनुभव किया भारत को उस तरह की वृद्धि में तेजी या वृद्धि में गिरावट की उम्मीद नहीं करनी चाहिए और संभव है कि भारत वृद्धि के ऊंचे स्तर को लंबे समय के लिए स्थायी बनाने में सक्षम हो।

स्थान संबंधी विशिष्टताः भारत के पास उसके जनसांख्यिकीय प्रोफाइल और विकास के मामले में राज्यों के बीच बड़ी विविधता है-

हां प्रायद्वीपीय भारत (पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश) और आंतरिक प्रदेश (मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार) के बीच एक स्पष्ट विभाजन है:

डब्ल्यूए जनसंख्या में सटीक वृद्धि और गिरावट के साथ प्रायद्वीपीय राज्य चीन और कोरिया के निकट स्वरूप प्रदर्शित करते हैं,

यह अंतर, निःसंदेह, ज्यादातर प्रायद्वीपीय राज्यों के डब्ल्यूए अनुपात के उच्चतम स्तर पर पूर्वी एशिया (पश्चिम बंगाल कोरिया के उच्चतम स्तर के नजदीक है, इसके बहुत नीचे टीएफआर की वजह से) में देखे गए स्तरों से नीचे रहेगा।

इसके उलट, डब्ल्यूए जनसंख्या में कुछ समय की वृद्धि के साथ भीतरी प्रदेश अपेक्षाकृत युवा और गतिशील बने रहेंगे.

➡️ राज्यों के बीच में यह अंतर उनके अलग-अलग टीएफआर की वजह से है। इसका मतलब, जनसांख्यिकीय तौर पर, भिन्न नीतिगत चिंताओं के साथ यहां दो तरह के भारतीय हैं:-

  1. एक भारत जो जल्द ही बूढ़ा होने लगेगा, बुजुर्गों और उनकी आवश्यकताओं पर अधिक ध्यान दिए जाने की जरूरत के साथ, और;
  2. युवा भारत, जिन्हें शिक्षा, कौशल और रोजगार के मौके उपलब्ध कराने पर होगा।

➡️ निःसंदेह, भारत के अंदर इस तरह की विविधता अधिक श्रम गतिशीलता के माध्यम से सुलझाना फायदेमंद होगा, जिसके प्रभाव से यह जनसांख्यिकीय असंतुलन घट सकता है.

वृद्धि के प्रभावः भारत के विशिष्ट जनसांख्यिकीय ढांचे के दो महत्वपूर्ण वृद्धि-निष्कर्ष रहेंगे:

  1. भारत के लिए जनसांख्यिकीय लाभांश का उच्चतम स्तर तेजी से पास आता दिखाई दे रहा है- 2020 की शुरुआत में उच्चतम स्तर तक- प्रायद्वीपीय भारत 2020 के उच्चतम स्तर पर पहुंच जाएगा जबकि आंतरिक प्रदेशों में यह 2040 के आसपास पहुँचेगा।
  2. विकास का प्रभाव भी पूरे भारत में अलग-अलग तरह का रहेगा, मौजूदा गरीब राज्यों की प्रति व्यक्ति जीडीपी धनी राज्यों की तुलना में अधिक होगी। इसका मतलब, राज्यों के बीच जनसांख्यिकीय लाभांश आय को बढ़ाने का एक मौका लाएगा।

आउटलायर्स (केंद्र बिंदु से दूर कुछ राज्य)-

कुल मिलाकर प्रोत्साहन देने वाला ढांचा कुछ ‘रुचिकर आउटलायर्स’ बनाएगा जिनका क्षेत्र पर और वहां रहने वाले लोगों पर अपना खुद का प्रभाव पड़ेगा:

  • बिहार, जम्मू और कश्मीर, हरियाणा और महाराष्ट्र सकारात्मक आउटलायर्स हैं जिनमें आने वाले वर्षों में अत्यधिक जनसांख्यिकीय लाभांश की उम्मीद कर सकते हैं, जिसका अनुमान उनकी आय के उनके मौजूदा स्तर के आधार पर लगाया जा सकता है।
  • यह अतिरिक्त लाभांश बिहार को बदलने में मदद करेगा, जबकि पहले से धनी हरियाणा और महाराष्ट्र को भारत की औसत प्रति व्यक्ति आय से कहीं आगे ले जाएगा।
  • वहीं दूसरी ओर, केरल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल नकारात्मक आउटलायर्स हैं। उनका भावी लाभांश उनकी आय के स्तर से अपेक्षाकृत कम है।

यदि मुखर (Robust) सुधार और तेजी के माध्यम से इसे समायोजित नहीं किया जाता तो यह गरीब राज्यों को और पीछे करेगा, जबकि अपेक्षाकृत धनी केरल संभवतः औसत में बदल जाएगा क्योंकि इसकी वृद्धि की गति तेजी से नीचे गिर रही है।

निष्कर्ष (Conclusion)

भारत की डब्ल्यूए आबादी बढ़ने के नजदीक है। इसलिए, अगले पांच वर्षों में आर्थिक वृद्धि में बढ़त शीर्ष स्तर पर रहने की संभावना है।
पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्था की तुलना में, भारत का डब्ल्यूए अनुपात कहीं अधिक नियमित तरीके से नीचे आएगा-
यही वजह है कि भारत वृद्धि में तेज गिरावट से बचने में सक्षम रह सकता है (जैसे कि इससे पूर्व के मामलों में देखा गया)।

इसके साथ ही, भारत के प्रायद्वीपीय और भीतरी राज्यों में स्पष्ट जनसांख्यिकीय विभिन्नता इसके शीर्षतम् स्तर पर पहुंचने के समय में बड़ा अंतर पैदा करेगी, इसके साथ ही अत्यधिक श्रम गतिशीलता के माध्यम से जनसांख्यिकीय असंतुलन को कम करने का मौका देगी।

भारत को जनसांख्यिकीय लाभांश के शीर्ष पर पहुंचने के लिए अधिक समय तक इंतजार करने की जरूरत नहीं है- यह कहना अच्छा रहेगा कि मौका ‘जल्द ही निकलने वाला’ है।

इसलिए सदी में एक बार आने वाला यह मौका चूकना नहीं चाहिए, यह आवश्यक सुधारों, नीतियों और उपयुक्त कार्रवाई को जितना जल्दी संभव हो सके एक साथ लाने का बहुप्रतीक्षित समय है।

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