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चित्तौड़गढ़ दुर्ग (Chittorgarh Fort) - gk website
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चित्तौड़गढ़ दुर्ग (Chittorgarh Fort)

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चित्तौड़गढ़ दुर्ग
(Chittorgarh Fort)

Chittorgarh-Fort
Chittorgarh-Fort

त्याग, वीरता, शौर्यता, स्वतन्त्रता, स्वाभिमान का प्रतीक चित्तौड़गढ़ दुर्ग को राजस्थान का गौरव कहा जाता है । यह राजस्थान का प्रथम गिरी दुर्ग है ।

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यह दुर्ग अजमेर खण्डवा जाने वाली रेलमार्ग पर चित्तौड़गढ़ जंक्शन से 4 किलोमीटर पूर्व में स्थित है ।

यह दुर्ग अरावली पर्वतमाला के शिखर पर मेसा के पठार पर समुद्रतल से 1850 फीट की ऊँचाई पर स्थित है । गम्भीरी तथा बेडच के संगम पर स्थित है ।

इस दुर्ग के विषय में कहा जाता है कि “गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गलैया”

चित्तौड़गढ़ दुर्ग के निर्माण के बारे में प्रामाणिक जानकारी का अभाव है। कविराज श्यामलदास के ग्रन्थ वीर विनोद के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण 7वी. सदी में मौर्य शासक चित्रांगद मोर्य ने करवाया था ।

734 ई. में बप्पा रावल ने मोर्य शासक मानमोरी से इस दुर्ग को जीता था। इसके उपरान्त इस दुर्ग पर परमार शासक मुंज तथा गुजरात के सोलंकी राजा सिद्धराज जससिंह का अधिकार रहा ।

उपनाम :- चित्रकोट, चित्रकुट, खिज्राबाद, लिविंगफोर्ट, किलों का सिरमोर, विचित्रकुट, राजस्थान का गौरव, दक्षिणी पूर्वी प्रवेश द्वार, मेवाड़ का मुकुट आदि ।

इस दुर्ग की आकृति “व्हेल मछली” के समान है ।

क्षेत्रफल की दृष्टि से यह राजस्थान का सबसे बड़ा दुर्ग है । यह दुर्ग राजस्थान का सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट है । इस दुर्ग की लम्बाई 8 किलोमीटर तथा चौड़ाई 2 किलोमीटर है, व प्राचीर का घेरा 11.2 किलोमीटर है । इतिहास प्रसिद्ध चित्तौड़गढ़ दुर्ग अपने 3 साकों के लिये जाना जाता है ।

1. प्रथम साका :- सन् 1303 में रतन सिंह प्रथम के समय जब अल्लाउद्दीन खिलजी ने इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया था । उस समय गौरा-बादल युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए तथा रतन सिंह प्रथम की पत्नी पद्मिनी ने 1600 राजपूत रानियों के साथ जौहर रचाया था । यह मेवाड़ का प्रथम शाका था ।

2. द्वितीय साका :- सन् 1534 में गुजरात के बहादूरशाह ने महाराणा सांगा की पत्नी रानी कर्मावती के समय यहाँ पर आक्रमण किया । कर्मावती ने सहायतार्थ हेतु मुगल शासक हुमायू को राखी भेजी थी । लेकिन हुमायू कर्मावती की सहायता हेतु नही आ सका तथा कर्मवती के नेतृत्व में राजपूत ललनाओं ने जौहर रचाया था । इस दौरान बाघसिंह लड़ता हुआ मारा गया था ।

3. तृतीय साका :- सन् 1567 में जब अकबर ने उदय सिंह पर आक्रमण किया उस समय सम्पन्न हुआ । इस दौरान जयमल-फत्ता युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए ।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग में पूर्व का बडा दरवाजा सूरजपोल कहलाता है । जबकि इसके उत्तर में लघु प्रवेश द्वार लाखोटा बारी स्थित है ।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर पहुचने के लिये 7 दरवाजे (पोल) बने हुए है । पाडन पोल, भेरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, लक्ष्मण पोल, जोडला पोल व राम पोल

पाडन पोल :- मुख्य प्रवेश द्वार तथा इसके बाये ओर बाघसिंह का स्मारक बना हुआ है ।

भैरव पोल :- जयमल-फत्ता व कल्ला राठौड़ की छत्रियाँ है तथा देसूरी के शासक भैरोदास गुजरात के बहादूरशाह से युद्ध करते हुए मारे गये । मुख्य प्रवेश द्वार टूट जाने पर उदयपुर के महाराणा फतेह सिंह ने इसका नव निर्माण करवाया था ।

हनुमान पोल :- यहां एक छोटा सा हनुमान मन्दिर है ।

गणेश पोल :- इस प्रवेश द्वार पर गणेश जी का मन्दिर स्थित है ।

लक्ष्मण पोल :- यहां लक्ष्मण जी का छोटा सा मन्दिर है ।

रामपोल :- यह प्रमुख प्रवेश द्वार है, यह पश्चिमाभिमुख है तथा भारतीय स्थापत्य कला एवं हिन्दू संस्कृति का प्रतीक है । यहां राव फत्ता का चबूतरा स्थित है, व राम मन्दिर बना हुआ है तथा इसके समीप बाहर एक सवा मण का भाला रखा हुआ है ।

विजय स्तम्भ :- भगवान विष्णु को समर्पित विजय स्तम्भ को विष्णु स्तम्भ भी कहा जाता है । इस स्तम्भ का निर्माण 1448 ई. में महाराणा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर विजय के उपलक्ष्य में करवाया था ।

122 फीट ऊँचा 9 मंजिला तथा 157 सीढ़ियों वाले विजय स्तम्भ को डॉ गर्टज ने मूर्तिकला का विश्वकोष कहा है ।

विजय स्तम्भ में 9 खण्ड नवनिधियों के प्रतीक माने जाते है ।

विजय स्तम्भ के वास्तुकार जडवा तथा इसके पत्र नापा पमा तथा पंजा थे ।

विजय स्तम्भ की आठवी मंजिल बिजली गिरने से नष्ट हो गई थी, जिसका पूनः निर्माण विक्रमी संवत् 1911 में मेवाड़ के तत्कालीन शासक स्वरूप सिंह ने करवाया था ।

यह वर्तमान में “राजस्थान पुलिस का प्रतीक चिह्न” है ।

विजय स्तम्भ के उपनाम :- जय स्तम्भ, विष्णु स्तम्भ, विक्ट्री टावर, भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष, मूर्तियों का अजायबघर, राजस्थान पुलिस का प्रतीक चिन्ह, नौ मंजिला भवन आदि ।

कर्नल टॉड़ ने विजय स्तम्भ के विषय में कहा है – “यह कुतुब मीनार से भी बेहतरीन है” |

जैन कीर्ति स्तम्भ :- यह दुर्ग के पूर्व की ओर स्थित आदिनाथ को समर्पित इस कीर्तिस्तम्भ का निर्माण बघेरवाल जैन महाजन जीजा द्वारा करवाया गया था ।

बारहवी सदी में निर्मित यह 7 मंजिला स्तम्भ है । जैन देवगणों की मूर्तियों से सुसज्जित है ।

श्रृंगार चंवरी :- कुम्भा ने अपनी पुत्री के विवाह के लिये बनवाया था ।,

फतहप्रकाश महल :- राज्य सरकार द्वारा इसमें पूरातत्व संग्रहालय की स्थापना की गई है ।

कुम्भा महल :- कुम्भा महल में दिवाने ए आम, संरत गोखड़ा, जनाना महल, कवड़पड़ा महल आदि बने हुए है |

सतबीस देवरी :- यह जैन मन्दिर है । इसमें 27 गुम्बद बने हुए है । इसकी आकृति देलवाड़ा के जैन मन्दिर से मिलती-जुलती है ।

कुम्भश्याम मन्दिर :- विष्णु के वराह अवतार का मन्दिर है । इसके सामने एक छतरी में गरूड़ भगवान की मूर्ति स्थित है ।

मीरा मन्दिर :- इस मन्दिर के भीतर कृष्ण भक्ति में लीन भजन गाती मीरा का चित्र लगा हुआ है तथा इसके सामने गुरू रैदास की छतरी बनी हुई है ।

नोट :- इस मन्दिर में ही मीरा द्वारा विष का पान किया था । यह मन्दिर इन्डो आर्य शैली में बना हुआ है ।

गौमुख कुण्ड :- यहां एक गौमुखी चट्टान से शिवलिंग पर झरना गिरता रहता है इस स्थान को पवित्र माना गया है

दुर्ग में स्थित अन्य ऐतिहासिक स्थल

प्रमुख मन्दिर :- राम मन्दिर, तुलजा भवानी मन्दिर, सिद्देश्वर महादेव मन्दिर (इस मन्दिर में भगवान शिव जी की एक ही पत्थर पर त्रिमूर्ति बनी हुई है)

कालिका माता मन्दिर :- प्राचीन सूर्य मन्दिर, तथा इस मन्दिर में कई सूर्य की मूर्तियां बनी हुई है ।

कालिका माता सूर्यवंशी गहलोतों की कुलदेवी है ।

नौगजा पीर :- मान्यता है कि यहाँ बिना माप की नो गज की चादर चढ़ाई जाती है, मापकर लाने पर चादर छोटी पड़ जाती है ।

अन्य :- शाहजहां की कैद, चतरंग मोहरी, महालक्ष्मी मन्दिर, नीलकंठ महादेव मन्दिर, चारभुजा मन्दिर आदि ।

बनवीर की दीवार, तोपखाना, मोती बाजार, जौहर कुण्ड, सूरजपोल, बिड़ला धर्मशाला, लाखेटा बारी, हरामियों का बाड़ा आदि ।

प्रमुख महल :- पद्मनी महल, राणा रतन सिंह महल, जयमल-फत्ता हवेली, गौरा-बादल महल, नवलखा बुर्ज आदि

प्रमुख कुण्ड :- खातन बावड़ी, भीमलत कुण्ड़, सूर्य कुण्ड, रतन कुण्ड, रंग-बिरंगी मछलियों का कुण्ड, झाली रानी का कुण्ड, घी-तेल की बावड़ी आदि ।


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