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अजमेर का चौहान वंश (Chauhan Vansh of Ajmer) (Ajmer ka chauhan Vansh) - gk website
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अजमेर का चौहान वंश (Chauhan Vansh of Ajmer) (Ajmer ka chauhan Vansh)

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 अजमेर का चौहान वंश
(Chauhan Vansh of Ajmer)

अजमेर-का-चौहान-वंश
अजमेर-का-चौहान-वंश

✔️ चौहान मूल रूप से जाँगल प्रदेश के निवासी थे । सांभर नामक प्रदेश इनके राज्य का महत्वपूर्ण भाग था।
✔️ चौहानों की राजधानी अहिच्छत्रपुर नागौर थी ।
✔️ चन्द्रवरदाई द्वारा रचित पृथ्वीराज रासों महाकाव्य के अनुसार चौहानों की उत्पति अग्निकुण्ड से मानी गई है। मुहणोंत नैणसी तथा सूर्यमल मिश्रण भी चन्दबरदाई के अग्नि कुण्ड सिद्धान्त का समर्थन करते है ।
✔️ पृथ्वीराज रासौ महाकाव्य के अनुसार गुरू वशिष्ट द्वारा आबू पर्वत पर किये गये यज्ञ से चालुक्य, चौहान, परमार तथा राजपूत प्रतिहारों की उत्पति हुई ।
✔️ जेम्स कर्नल टॉड़ के अनुसार चौहानों की उत्पति विदेशियों से हुई है ।
✔️ कर्नल टॉड के अनुसार चौहान मध्य एशिया के निवासी थे ।
✔️ डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार बिजोलिया शिलालेख से ज्ञात होता है कि चौहानों की उत्पति ब्राह्मणों से हुई।
✔️ पृथ्वीराज विजय के लेखक जयानक तथा गौरी शंकर औझा के अनुसार चौहानों की उत्पति सूर्यवंशी सिद्धान्त से हुई
✔️ चौहान वंश का संस्थापक या आदि पुरूष वासुदेव चौहान को माना जाता है । बिजौलिया शिलालेख के अनुसार सन् 551 ईस्वी में वासुदेव चौहान ने सांभर झील का निर्माण करवाया । वासुदेव चौहान का उत्तराधिकारी सामन्तराज हुआ। सामन्तराज का वासुदेव से क्या सम्बन्ध था इसका पता नही लगता है

✔️ सामन्तराज के पश्चात चौहान वंश का उत्तराधिकारी नरदेव हुआ । नरदेव के पश्चात सामन्तराज का पुत्र जयराज तथा उसके पौत्र विग्रहराज I, तथा चन्द्रराज । चौहान वंष के उत्तराधिकारी हुए ।
✔️ चन्द्रराज प्रथम के बाद इसका पुत्र गोपेन्द्र राज चौहान वंष का उत्तराधिकारी हुआ |
नोट :- गोपेन्द्र राज का पुत्र दुर्लभराज प्रतिहार शासक वत्सराज का सामन्त था । दुर्लभराज ने वत्सराज के साथ मिलकर बंगाल के शासक धर्मपाल को पराजित किया था ।
नोट :- दुर्लभराज का उत्तराधिकारी गुवक प्रथम हुआ, जो कि प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय का सामन्त था। गुवक प्रथम ने सीकर में प्रसिद्ध हर्षनाथ मन्दिर का निर्माण करवाया ।
✔️ गुवक प्रथम का उत्तराधिकारी चन्द्रराज द्वितीय हुआ । चन्द्रराज द्वितीय के बाद गुवक द्वितीय ने शासन किया।
नोट :- गुवक द्वितीय का पुत्र चन्दनराज था जो चौहान वंश का अगला उत्तराधिकारी हुआ । चन्दनराज ने तोमर वंश के रूद्र को पराजित किया । चन्दनराज की पत्नी रूद्राणी थी, जिसे आत्मप्रभा नाम से भी जाना जाता है, जो कि योगिक क्रिया में निपुण थी । वह शिव की उपासक थी। वह प्रतिदिन पुष्कर में 1000 दीपक अपने इष्टदेव के सम्मान में प्रज्जवलित करती थी ।
✔️ चन्दनराज का पुत्र वाक्पति चौहान वंश का शासक बना । हर्ष शिलालेख के अनुसार इसने महाराजधिराज की उपाधि धारण की । जयानक द्वारा रचित “पृथ्वीराज विजय में इसे 188 युद्धों में विजयी होना बताया है” .
✔️ वाक्पति के उत्तराधिकारी विन्धनराज तथा सिंहराज हुए ।
नोट :- सिंहराज ने दिल्ली के तोमर तथा प्रतिहार शासकों को पराजित किया था ।
नोट :- विग्रहराज द्वितीय चौहान वंश का प्रथम प्रतापी शासक हुआ इसने अन्हिलवाड़ा (गुजरात) के शासक मूलराज प्रथम को पराजित किया था ।
नोट :- विग्रहराज द्वितीय ने भृगूकच्छ में अपनी कुलदेवी आशापुरा माता मन्दिर का निर्माण करवाया।
✔️ विग्रहराज द्वितीय के उत्तराधिकारी दुर्लभराज द्वितीय व गोविन्दराज तृतीय उत्तराधिकारी हुए । गोविन्दराज तृतीय को पृथ्वीराज विजय में “शत्रु संहारक” की उपाधि दी गई है ।

अजयराज (Ajayraj)

✔️ अजयराज पृथ्वीराज प्रथम का पुत्र था । चौहान वंश का दूसरा प्रतापी शासक अजयराज हुआ ।

✔️ अजयराज के काल को चौहान वंश के साम्राज्य निर्माण का काल कहा जाता है । अजयराज ने 1113 में अजयमेरू नगर बसाया । सन् 1113 में अजयमेरू दुर्ग के निर्माण के समय इसको अजयमेरू नाम से ही जाना जाता है कालान्तर में मेवाड़ के शासक रायमल के पुत्र पृथ्वीराज की पत्नी ताराबाई के नाम पर इस दुर्ग का नाम तारागढ़ दुर्ग रखा गया । रायमल के पुत्र पृथ्वीराज अजमेर के प्रशासक थे ।
✔️ पृथ्वीराज को उड़ना शासक (घोडे से भी तेज धावक क्षमता होने के कारण) भी कहा जाता है ।
✔️ अजयराज ने चौहान वंश की साम्राज्य सीमाओं का विस्तार पंजाब व भटिण्डा तक किया ।
✔️ अजयराज ने चाँदी के सिक्के चलवाये, जिन पर अपनी रानी सोमलवती का नाम भी अंकित है ।

अर्णोराज 1133 – 1150 (Aranoraj)

✔️ अर्णोराज अजयराज के पुत्र थे ।
✔️ अर्णोराज ने मालवा के शासक नरवर्मा को पराजित किया ।
✔️ अर्णोराज ने महाराजधिराज, परम भट्टारक तथा महाराज की उपाधियाँ धारण की ।
✔️ अर्णोराज ने चालुक्य शासक जयसिंह की पुत्री कन्चन देवी थी ।
✔️ अर्णोराज ने 1137 में प्रसिद्ध आनासागर झील का निर्माण करवाया ।
✔️ अर्णोराज ने पुष्कर में वराह मन्दिर का निर्माण करवाया ।

विग्रहराज चतुर्थ 1153-1163 (Vigraharaj IV)

✔️ विग्रहराज चतुर्थ को बीसलदेव के नाम से भी जाना जाता है ।
✔️ विग्रहराज चतुर्थ ने मलेच्छों (तुर्को) से देश की रक्षा की । (दिल्ली स्थित शिवालिक लेख के अनुसार)
✔️ विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) ने अपने नाम पर वर्तमान टोंक जिले में स्थित बीसलपुर कस्बा बसाया ।
✔️ ऐसा माना जाता है कि वर्तमान टोंक जिले में स्थित बीसल सागर बाँध जिसे वर्तमान में बिसलपुर बाँध भी कहा जाता है, का निर्माण चौहान शासक बीसलदेव ने करवाया था ।
नोट :- राज्य की सबसे बड़ी पेयजल परियोजना बीसलपुर बाँध परियोजना है, जबकि राज्य की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजना इन्दिरा गाँधी नहर सिंचाई परियोजना है ।
✔️ विग्रहराज चतुर्थ एक कुशल योद्धा, साहित्य प्रेमी तथा साहित्यकारों के आश्रय दाता थे । प्रजा में इन्हे कवि बन्धु के नाम से जाना जाता था ।

✔️ समकालीन साहित्यकार इन्हे कवि बान्धव नाम से सम्बोधित करते थे ।
✔️ ललित विग्रह नाटक के लेखक सोमदेव इन्ही के दरबार में आश्रय पाते था ।
✔️ विग्रहराज चतुर्थ ने संस्कृत भाषा में हरिकेली नामक नाटक लिखा है, जिसमें भगवान शिव तथा अर्जुन के मध्य हुए युद्ध का वर्णन है ।
✔️ विग्रहराज चतुर्थ ने अजमेर में एक संस्कृत पाठशाला का निर्माण करवाया । जिसे कालान्तर में कुतुबुद्दीन ऐबक ने तुडवाकर अढ़ाई दिन के झोपडे (1199 में) का निर्माण करवाया । “माना जाता है कि इसका निर्माण ढाई दिन में पुरा हुआ था इस कारण इसे ढाई दिन का झोपड़ा कहा जाता है । ऐसा भी माना जाता है कि यहां पीर पंजाब शाह का ढाई दिन का उर्स लगता है, इस कारण इसे ढाई दिन का झोपड़ा कहते है”I

विग्रहराज IV

✔️ विग्रहराज चतुर्थ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अपरगांगेय चौहान वंश का उत्तराधिकारी हुआ । इसकी हत्या 1164 में पृथ्वीराज द्वितीय ने कर दी, तथा स्वयं 1164 में चौहान वंश का शासक बना ।

पृथ्वीराज द्वितीय 1164-1169 :- (Prithviraj II)

✔️ पृथ्वीराज द्वितीय ने तुर्को को पराजित किया तथा हासी (हरियाणा) पर अपना अधिकार कर लिया। पृथ्वीराज द्वितीय ने अपने गुहिल वंशीय मामा किल्हण को किलेदार नियुक्त किया। पृथ्वीराज द्वितीय की निसन्तान मृत्यु हो गई ।।

सोमेश्वर 1169-1177 :- (Someshwar)

✔️ पृथ्वीराज द्वितीय की निसन्तान मृत्यु हो जाने के उपरान्त इसका चाचा तथा अर्णोराज का पुत्र सोमेश्वर 1169 में चौहान वंश का शासक बना।
✔️ सोमेश्वर ने कर्पूरी देवी से विवाह किया ।
✔️ सोमेश्वर ने अपने शासन काल में मूर्तिकला को प्रोत्साहन दिया ।
✔️ सोमेश्वर ने स्वयं की तथा अपने पिता अर्णोराज की प्रतिमाए स्थापित करवाई ।
✔️ चालुक्य वंश के भीम द्वितीय ने सोमेश्वर की हत्या कर दी ।
✔️ सोमेश्वर के दो पुत्र पृथ्वीराज तृतीय तथा हरिराज थे ।

पृथ्वीराज चौहान तृतीय 1177-1192 :- (Prithviraj Chauhan III)

✔️ पृथ्वीराज चौहान के पिता का नाम सोमेश्वर तथा माता का नाम कर्पूर देवी था ।
✔️ पृथ्वीराज चौहान चौहान वंश के अन्तिम तथा प्रतापी शासक हुए
✔️ अपने पिता सोमेश्वर की मृत्यु के उपरान्त पृथ्वीराज चौहान 11 वर्ष की अल्पायु में चौहान वंश के शासक बने ।
✔️ पृथ्वीराज चौहान के अल्प वयस्क होने के कारण लगभग एक वर्ष तक इनकी माँ कर्पूर देवी ने प्रधानमंत्री कदम्बवास तथा सेनापति राजभुल्लभ की सहायता से शासन कार्य किया
✔️ सन् 1178 में पृथ्वीराज चौहान ने शासन सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली । इस दौरान पृथ्वीराज चौहान ने कई महत्वपूर्ण अधिकारियों की नियुक्ति की ।
✔️ इस दौरान पृथ्वीराज चौहान ने प्रताप सिंह नामक अधिकारी की नियुक्ति की ।
✔️ अपने साम्राज्य विस्तार की प्रक्रिया में पृथ्वीराज चौहान ने सर्वप्रथम अपने चाचा नागार्जुन को 1178 में पराजित किया।
✔️ सन् 1182 में पृथ्वीराज चौहान ने भण्डनायक जाती के विद्रोह का दमन किया ।
✔️ सन् 1182 में ही पृथ्वीराज चौहान ने चालुक्य वंश के शासक परमार्दी देव को पराजित किया, तथा चालुक्यों की राजधानी माहोबा पर अधिकार कर लिया । इस दौरान परमार्दी देव के आल्हा और उदल नामक सेनापति मारे गये, तथा परमार्दी देव ने भी आत्महत्या कर ली । इस युद्ध को तुमूल युद्ध के नाम से जाना जाता है ।
✔️ पृथ्वीराज तृतीय तथा कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचन्द की पुत्री संयोगिता के विवाह प्रसंग को लेकर दोनों में शत्रुता की खाई अधिक गहरी हो गई । इसी का परिणाम था कि सन् 1192 के तराईन के द्वितीय युद्ध में जयचन्द ने राजपूत होते हुए भी एक राजपूत शासक पृथ्वीराज चौहान की सहायता नही की । अतः इस समय तक पृथ्वीराज चौहान ने अपने दुश्मनों की संख्या बढ़ा ली व मित्रों की संख्या कम कर ली ।
✔️ सन् 1191 के तराईन के प्रथम युद्ध में मोहम्मद गौरी की पराजय हुई । (वर्तमान में तराईन नामक स्थान हरियाणा प्रान्त के करनाल जिले में स्थित है)
✔️ तराईन का द्वितीय युद्ध सन् 1192 में मोहम्मद गौरी तथा पृथ्वीराज चौहान के मध्य लड़ा गया, जिसमें पृथ्वीराज चौहान की पराजय हुई व विजय श्री मोहम्मद गौरी को हाथ लगी ।
✔️ तराईन के द्वितीय युद्ध के बाद पृथ्वीराज चौहान का अन्त हो गया ।
✔️ पृथ्वीराज चौहान का अन्त वर्तमान में भी विवादास्पद बना हुआ है ।
✔️ पृथ्वीराज रासों के अनुसार– पृथ्वीराज चौहान को गजनी ले जाया गया तथा वहां पृथ्वीराज चौहान ने चन्द वरदाई द्वारा सुनाई गई कविता के आधार पर शब्दभेदी बाण से मोहम्मद गोरी को मार गिराया तथा अन्त में पृथ्वीराज चौहान तथा उसके दरबारी कवि चन्दरवरदाई ने भी आत्महत्या कर ली |
✔️ पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के साथ ही सांभर के चौहान वंश का अन्त हो गया ।
नोट :- पृथ्वीराज चौहान को इतिहास में “रायपिथोरा” कहा जाता है ।
नोट :- पृथ्वीराज चौहान को “दलपूगल” के नाम से भी जाना जाता है ।
✔️ माना जाता है कि पृथ्वीराज चौहान ने दिल्ली स्थित पिथौरागढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया था ।

नोट :- पृथ्वीराज चौहान के काल में कई कवि एवं विद्वान आश्रय पाते थे जिनमें पृथ्वीराज रासौ का लेखक चन्दर वरदाई, पृथ्वीराज विजय का लेखक जयानक, वाक्पति, विद्यापति गौड़, विश्वरूप, पृथ्वीभट्ट आदि ।
✔️ हम्मीर रासों महाकाव्य के अनुसार पृथ्वीराज चौहान ने गौरी को सात बार पराजित किया जबकि पृथ्वीराज प्रबन्ध के अनुसार पृथ्वीराज चौहान ने गौरी को आठ बार पराजित किया । पृथ्वीराज रासों में तथा सुर्जन चरित्र में मोहम्मद गौरी को पृथ्वीराज चौहान के हाथों इक्कीस बार पराजित होना बताया है ।
✔️ प्रबन्ध चिन्तामणि जो कि मेरूतंग द्वारा रचित है के अनुसार पथ्वीराज चौहान ने गौरी को तैइस बार पराजित किया।
✔️ पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि जयानक भट्ट कश्मीर के निवासी थे ।

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