Bhilwara (भीलवाड़ा) Jila Darshan (Rajasthan)

भीलवाड़ा

उपनाम- राज्य की वस्त्र नगरी, टैक्सटाईल सिटी, तालाबो व बांधो की नगरी, राज्य की अभ्रक नगरी

Bhilwara (भीलवाड़ा) Jila Darshan (Rajasthan)
Bhilwara-district-map

परिचय
कर्नल जैम्स टॉड ने अपने ग्रंथ द एनाल्स एंड एंटीक्वीटीज आफ राजपुताना स्टेट में भीलवाड़ा का उल्लेख किया है।
ऐसा माना जाता है कि यहां भीलो की बस्तियां होने के कारण यह क्षेत्र भीलवाड़ा कहलाया।
भीलवाड़ा में मेवाड़ राज्य की एक टकसाल थी जिसमे भिलाड़ी नाम के सिक्के डाले जाते थे इसलिए इस क्षेत्र को भीलवाड़ा नाम से जाना जाने लगा।
भीलवाड़ा की बिजोलिया व चितौड़ की भैंसरोड़गढ तहसील का क्षेत्र खैराड़/माल खैराड़ के नाम से जाना जाता है।
भीलवाड़ा, टोंक व बुंदी मे खैराड़ी बोली बोली जाती है।
यहां का नाहर व सींग वाले शेरो का नृत्य प्रसिद्ध है।
बुंदी व बिजोलिया के बीच का पथरीला व कठोर भाग बरड़ क्षेत्र कहलाता है।
यह सर्वाधिक अभ्रक व सुती वस्त्र मीलो वाला जिला है।
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वनस्पति घी का प्रथम कारखाना भी यही पर लगाया गया था।
अर्न्तराष्ट्रीय बहरूपीया कलाकार जानकी लाल का सम्बंध भी इसी जिले से है।
सहकारी क्षेत्र की पहली कताई मील गुलाबपुरा मे 1972 में स्थापित की गई।
भारत की सबसे सम्पन्न पाषाणकालीन बागोर सभ्यता भी यही है।
मंदाकिनी मंदिर व वहां के शिलालेख भी पुरातत्व की दृष्टी से अहम है।
यहां शाहपुरा में होली के दुसरे दिन फुलडोल मेला लगता है।
↪ बागोर व जहाजपुर यहां की प्रमुख सभ्यताएं है।
1988 में यहां पर माणिक्यलाल वर्मा टेक्सटाइल इंस्टिट्युट की स्थापना की गई है।
1949 में जिला बनाया गया व 1951 से 1961 के मध्य दो ग्राम चितौड़गढ से इसमे जोड़े गए। 
↪ इसके साथ ही चार तहसीले बदनौर, करेड़ा, फुलिया व अरवड़ समाप्त कर दी गई।

स्थान विशेष

ऊपरमाल भीलवाड़ा की बिजोलिया व चितौड की भैंसरोड़गढ तहसील का क्षेत्र। यहां पर विजयसिंह पथिक ने 1917 में हरियाली अमावस्या के दिन उपरमाल पंच बोर्ड की स्थापना की जिसका सरपंच श्री मन्नापटेल को बनाया।

बिजौलिया-

  • इसे विजयावल्ली के नाम से भी जाना जाता है।
  • इसे अशोक परमार ने बसाया।
  • अशोक परमार को बिजौलिया राणा सांगा ने 1527 में खानवा का युद्ध जीतकर उनकी वीरता से खुश होकर दिया था।
  • यहां धाकड़ जाति के लोग निवास करते है।
  • बिजौलिया किसान आंदोलन के लिए जाना जाता है जो 1897 से 1947 तक लगभग 44 वर्षों तक चला।
  • यह किसान आंदोलन देश का पहला व सबसे बड़ा तथा पूर्णतः अहिंसात्मिक आंदोलन था।
  • इस आंदोलन का संस्थापक साधु सीतरामदास था।
  • 1916 में इसकी बागडोर विजयसिंह पथिक ने संभाली।
  • यहां से एक हजार वर्ष पुराना भूमिज शैली का विष्णु मंदिर मिला है।

बरड़ – बरड़ आंदोलन 1922 में भंवर लाल सोनी के नेतृत्व में चलाया गया।

शाहपुरा –

  • यह अन्तर्राष्ट्रीय रामस्नेही समुदाय के लोगो का तीर्थस्थल है।
  • रामस्नेही सम्प्रदाय की पीठ पर फुलडोल महोत्सव आयोजित होता है।
  • यहां की फड़ चित्रकला भी प्रसिद्ध है।
  • यहां पर प्रताप सिंह बारहठ की हवेली व चमना बावड़ी आर्कषण का केन्द्र है।

श्रीलाल जोशी –

  • इन्हे पड़ चित्रकला के क्षेत्र में अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धी प्राप्त करने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धी प्राप्त करने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है।

आसींद – भीलवाड़ा जिले में गुर्जरो का तीर्थ स्थल आसींद तथा सवाई भोज का प्राचीन मंदिर है जहां प्रतिवर्ष भाद्र माह में मेला लगता है।

ऊपरमाल का पठार – भीलवाड़ा के दक्षिण पश्चिम भाग में स्थित इस पठार पर ही इतिहास प्रसिद्ध बिजौलिया स्थित है। वस्तुत यह भीलवाड़ा के मालवी पठार का विस्तार है। इस पठार से ही मेजा, कुराल, मांगली व घोड़ा पछाड़ नदियां जन्म लेती है और वहां स्थित गरदड़ा, गुढा व बरघा बांधो को जलापूर्ति करती है।

बनास का मैदान – बनास व उसकी सहायक नदियों से पोशित यह मैदान भीलवाड़ा जिले में पूर्णतः विस्तृत है। इसे मेवाड़ का मैदान भी कहते

है।

मेजा बांध – माण्डल के समीप कोठारी नदी पर निर्मित इस बांध से भीलवाड़ा शहर को जलापूर्ति होती है तथा इसके साथ ही माण्डल व बनेड़ा तहसीलो को सिंचाई हेतु जल की व्यवस्था होती है।

अडवान बांध – शाहपुरा के पास मानसी नदी पर बने इस बांध से 5.5 हैक्टेयर भूमि सिंचित होती है।

खारी बांध – इससे खारी सिंचाई परियोजना का संचालन किया जाता है।

हुरड़ा – 17 जुलाई 1734 को जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह ने मराठा शक्ति के विरूद्ध राजपुताना शासको को संगठीत करने के लिए सम्मेलन आयोजित किया था।

ओझीयाना – यह भीलवाड़ा की ताम्रयुगीन सभ्यता

बागोर – महासतीयो का टीला कोठारी नदी के तट पर इसी स्थान पर है। 

गंगापुर – यहां पर बाइसा महारानी गंगाबाई का मंदिर है।

माण्डलगढ – यह त्रिभुजाकार पहाड़ी पर स्थित एक दुर्ग है जहां पर तिलस्वा महादेव का मंदिर है व मेला लगता है।

मेनाल – यहां 12 वी सदी के चौहानकाल के लाल पत्थरो से बना महानालेश्वर मंदिर, रूठी रानी का मंदिर व हजारेश्वर मंदिर प्रमुख स्थल है। यहां के मंदिरो पर बनी विभिन्न प्रतिमाएं अजन्ता ऐलोरा की प्रतिमाओ की याद ताजा कर देती है। मेनाल जल प्रपात भी पर्यटको के लिए आकर्षण का केन्द्र है।

👉 प्रमुख बांध परियोजनाएं-
जैतपुरा बांध परियोजना
★ सरेरी बांध परियोजना
★ खारी बांध परियोजना
★ झाडोल बांध परियोजना
★ खोखुण्डा बांध परियोजना
★ अखाड़ बांध परियोजना

झील – माण्डताल झील

छतरी– राणा सांगा की छतरी

सभ्यता स्थल – बागोर व जहाजपुर

दुर्ग- सांगानेर दुर्ग – राणा सांगा द्वारा निर्मित व हम्मीरगढ, माण्डलगढ व बनेड़ा दुर्ग

प्रमुख मंदिर – 1. धनोप माता मंदिर 2. बाइसा महारानी मंदिर 3. सवाई भोज का मंदिर 4. कुशाल माता मंदिर

👉 कृषि विशेष-

➛ सर्वाधिक क्षेत्रफल वाली फसल – उड़द

सर्वाधिक उत्पादन वाली फसल – उड़द व सन

उद्योग –

सुती वस्त्र उद्योग – मेवाड़ टेक्सटाइल मिल्स व राजस्थान स्पिनिंग व वीवींग मिल अभ्रक इंट उद्योग

सौर उर्जा संयत्र – हुरड़ा में 5 मेगावाट

👉 खनिज

तांबा – पूर के निकट

सीसा – देवदास तथा देवपुर में

जस्ता – रामपुरा – आगुचा

बेरेलियम – देवड़ा व तिलोली गांव

अन्य प्रमुख खनिज – चाइना क्ले, अभ्रक, तामड़ा व यूरेनियम

जिला विशेष

राज्य में सर्वाधिक तालाबो द्वारा सिंचाई यहां पर होती है।

अभ्रक उत्पादन की दृष्टी से भीलवाड़ा का राज्य में प्रथम स्थान है।

यहां के शंकर लाल सोनी चान्दी की वस्तुओ पर कलाकारी के लिए प्रसिद्ध है।

लघु चित्रशैली में भीलवाड़ा के वयोवृद्ध चित्रकार बद्रीलाल सोनी को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है।

भवाई नृत्य के क्षेत्र मे छोगा भवाई का नाम सबसे पहले लिया जाता है। मेजा बांध की पाल पर ग्रीन माउंट मेजा पार्क बनाया गया है।

गुवारेड़ी मत्सय बीज केन्द्र में राज्य मे पहली बार ग्रास कॉर्प मछली के बीजो का सफल प्रयोग किया गया है।

यहां के बांका गांव मे प्रदेश की पहली अलंकृत गुफा खोजी गई है।

यहां के अभिजीत गुप्ता शतरंज में राज्य के पहले व देश के 17वें ग्रेड मास्टर बने है। ये 2005 मे देश के सबसे कम उम्र के इंटरनेशनल मास्टर बनें।

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