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BAD BANK

👉 What is bad bank in India?
बुरे बैंक

(BAD BANK)

बुरे-बैंक-BAD-BANK
BAD-BANK

परिचय (Introduction):-

What does bad bank mean?

➥ बुरे कर्ज का भार जैसे कि बैंकों के फंसे हुए कर्ज (एनपीए), विशेषकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (पीएसबी), पिछले कुछ वर्षों से हर गुजरती तिमाही के साथ बढ़ता जा रहा है, जिसके विभिन्न कारण हैं।

👉 आर्थिक और सामाजिक विकास प्रश्न भाग -6

➥ मार्च 2017 के अंत तक बैंकिंग व्यवस्था की संकटग्रस्त परिसंपत्तियां उनके कुल कर्ज के 12 फीसदी से अधिक थीं।

➥ पीएसबी, जिनके पास बैंकिंग परिसंपत्तियों के तकरीबन 70 फीसदी का स्वामित्व होता है, के संकटग्रस्त ऋण का अनुपात तकरीबन 16 फीसदी था।

➥ यही मुख्य वजह है कि पिछली कई तिमाही से बैंक नए कर्ज देने के इच्छुक नहीं हैं।

➥ 2016-17 की आखिरी तिमाही के अंत में, ऋण वृद्धि नकारात्मक रही है और पिछले दो दशकों के निम्नतम स्तर पर है।

➥ ऊंचे एनपीए की बढ़ती समस्या के समाधान के लिए, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) पिछले कुछ वर्षों में कई योजनाएं लेकर आया-

  • आधारभूत ढांचे के आसान पुनर्वित्तीयन (5/25 योजना), परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी (एआरसी), रणनीतिक ऋण पुनर्निर्माण (एसडीआर), परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा (एक्यूआर) और संकटग्रस्त परिसंपत्तियों का स्थायी निर्माण (एस4ए), लेकिन ये उपाय बैंकों के लिए बहुत राहत लेकर नहीं आए।

खतरे को दूर करने में जब व्यवहारिक उपचार असफल दिख रहे हैं, एक थोड़ा कम व्यवहारिक उपचार अपनी जगह बना रहा है, जो सरकार को बुरे बैंक स्थापित करने की सलाह देता है।

अवधारणा (Concept):-

Are banks good or bad?

सैद्धांतिक रूप से बुरे बैंक साधारण अवधारणा पर काम करते हैं, जैसे कि, बैंकों के कर्ज दो श्रेणियों में विभाजित होते हैं-अच्छे और बुरे।

बुरे बैंक द्वारा बैंकों के बुरे कर्ज खरीदे या अधिकार में लिए जाते हैं, जबकि अच्छे कर्ज बैंक के पास ही छोड़ दिए जाते हैं।

इस तरह से, बुरे कर्ज बैंकों की अच्छी परिसंपत्तियों को नहीं बिगाड़ते।

फिर बुरे कर्ज की समस्या से जूझ रहे बैंक वित्तीय तौर पर मजबूत स्थिति में आ जाते हैं, वे कर्ज देने की प्रक्रिया को फिर चालू कर देते हैं, जबकि बुरे बैंक की अवधारणा साधारण है, इसे लागू करना अत्यंत पेचीदा हो सकता है।

इसका खाका तैयार करने के लिए कई तरह के संगठनात्मक और वित्तीय विकल्प हैं।

आरबीआई ने भी अब इस तरह के बैंक स्थापित करने के पक्ष में संकेत दिए हैं, इसने ‘खाका ठीक तरह से तैयार हो’ के संबंध में विशेष ध्यान दिया है।

What is bad loan for a bank?

बुरे बैंक के मॉडल (Models of Bad Bank):-

हमें जरूरत के हिसाब से विश्व में बुरे बैंक के चार अलग तरह के मॉडल मिलते हैं, जो संक्षेप में नीचे बताए गए हैं:-

A. बैलेंस शीट की गारंटी:-

इस मॉडल में, संकटग्रस्त बैंक अपनी निवेश सूची (जैसे कि बुरी परिसंपत्तियां) के लिए सरकार से घाटे की गारंटी लेता है।

यह सरल है और कम खर्चीला तरीका है और जल्दी से लागू किया जा सकता है।

वैसे बुरे कर्ज सरकार की गारंटी लेते हैं, वे बैंक की बैलेंस शीट पर बने रहते हैं।

इसका मतलब कि जब बैंक अपनी बुरी परिसंपत्तियों को लेकर निश्चित हो जाते हैं, तब भी वे नए कर्ज देने की स्थिति में नहीं होते हैं। यह मॉडल भारत की मौजूदा जरूरतों को पूरा करने के लिए उपयुक्त नहीं है।

B. आंतरिक नवीनीकरण इकाईः-

यह मॉडल संकटग्रस्त बैंक के अंदर ही बुरा बैंक बनाने जैसा है।

बैंक अपने बुरे कर्ज को अपनी खुद की वित्तीय व्यवस्था के भीतर एक ‘अलग इकाई’ में रखते हैं और बुरी परिसंपत्तियों को नियंत्रित करने के लिए अलग प्रबंधन टीम बनाते हैं- टीम को अलग प्रोत्साहन राशि दी जाती है।

यह बैंक को पारदर्शिता बढ़ाने (ताकि बुरे कर्ज से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक हों) और उनके शेयरधारकों के बीच आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद करता है।

लेकिन यह भी बैंकों को नए कर्ज देने में सक्षम बनाने में सफल नहीं होता।

यह मॉडल भी भारत के लिए उपयुक्त नहीं लगता।

C. विशेष उद्देश्य इकाईः-

यह मॉडल ऊपर वर्णित दो मॉडलों से थोड़ा अलग है।
बैंकों के बुरे कर्ज का बोझ बैलेंस शीट से ‘हटा लिया’ जाता है और एक तरह की निधि में प्रतिभूतिकरण किया जाता है जिसे वित्तीय व्यवस्था में निवेशकों के विभिन्न समूहों को बेचकर निपटा दिया जाता है।
भारत के मामले में प्रतिभूतिकृत किए गए बुरे कर्ज क्षेत्र-विशेष वाले स्पेशल परपज व्हीकल (एसपीवी) के माध्यम से चलाए जा सकते हैं।
चूंकि एनपीए की समस्या कुछ क्षेत्रों (जैसे कि आधारभूत ढांचा और धातुओं) में केंद्रित है, यह मॉडल पर्याप्त उपयोगी दिखता है।
चूंकि यह प्रक्रिया ‘बाजार’ (प्रतिभूतिकृत बुरे कर्ज की कीमत के लिए) को शामिल करती है, इस मॉडल में पीएसबी को कम दोष मिलेगा।
बैंकों की बैलेंस शीट साफ-सुथरी रहेगी, जिससे वे नए कर्ज देना शुरू कर सकते हैं।

D. बुरे बैंक स्पिन ऑफः-

यह पूरे विश्व में अपनाया जाने वाला सबसे प्रचलित मॉडल है।
इस प्रारूप में, संकटग्रस्त बैंक अपने बुरे कर्ज को एक अलग बैंकिंग निकाय में हस्तांतरित कर देते हैं (जैसे कि बुरे बैंक)।
इस तरह बुरे कर्ज का जोखिम आसानी से संकटग्रस्त बैंक की बैलेंस शीट से बुरे बैंक को हस्तांतरित हो जाता है जो बैंक को नए कर्ज देने में सक्षम बनाता है।
इसलिए यह प्रारूप भारत की स्थिति को देखते हुए सबसे अधिक उपयुक्त दिखता है।
वैसे इसकी स्थापना के लिए कुछ विशेष व्यवस्थाएं किए जाने की आवश्यकता है, जैसे कि अलग से एक निकाय का गठन, जरूरी प्रबंधन कौशल को लाना, सूचना व्यवस्था और समुचित नियामक व्यवस्था सबसे अहम हैं।
यह एक महंगा मॉडल भी है। आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 द्वारा सुझाई गई सार्वजनिक क्षेत्र परिसंपत्ति पुनरुद्धार संस्था (पारापीएआरए) इसी श्रेणी के तहत आती है।
हालांकि, पारा का कुछ दूसरी तरह की समस्याओं पर भी असर होना अपेक्षित है, जैसे-कुछ निजी क्षेत्रों की कॉर्पोरेट इकाइयों की संकटग्रस्त बैलेंस शीट पर।

निष्कर्ष (Conclusion):-

What is a bad bank Upsc?

बैंकिंग व्यवस्था में बुरे कर्ज की स्थिति उस स्तर पर पहुंच गई है जो अब अर्थव्यवस्था में निवेश की संभावना को चोट पहुंचाने लगी है, आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 के मुताबिक इस पर सरकार को तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।

अगर हम सर्वेक्षण के सुझावों को मानें, सरकार के लिए ‘पारा’ की तर्ज पर एक अलग निकाय गठित करने की दिशा में विचार करना उपयुक्त दिखता है।

बुरे बैंक का गठन सिर्फ बैंकों के बुरे कर्ज की समस्या पर काम करेगा और उन्हें नए कर्ज देने के लिए दुरुस्त करेगा।

लेकिन यह अर्थव्यवस्था में निवेश की वजहों को प्रोत्साहित नहीं करेगा क्योंकि कुछ बड़े कॉर्पोरेट कर्ज लेने के लिए ठीक हालत में नहीं हैं (जिन पर निवेश की संभावनाएं निर्भर करती हैं)।

इसका मतलब भारत को इन कॉर्पोरेट इकाइयों को भी लाभ वाली स्थिति में लाना होगा।

केंद्रीय बजट 2017-18 पेश करने के बाद, सरकार ने आने वाले महीनों में इस तरह का निकाय बनाने की इच्छा जतायी है।

तब तक, भारत में व्यापार, उद्योग और बैंक इस मामले में सरकार की पहल का इंतजार कर रहे हैं।

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