ADDRESSING INEQUALITY

 असमानता पर ध्यान संकेंद्रण
(ADDRESSING INEQUALITY)

ADDRESSING-INEQUALITY

परिचय:-

➥ भारत में असमानता सरकार के लिए पहले से ही एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय रहा है।

➥ वैश्वीकरण की प्रक्रिया के मद्देनजर, यह बहस और भी तेज हुई।

➥ इस बीच, कुछ हालिया वैश्विक रिपोर्ट (2017 की शुरुआत) ने वैश्विक बहस के शीर्ष पर भारत की असमानता की चिंता को रखा है।

➥ इस मुद्दे से संबंधित कई प्रश्न विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं के बीच बहस का मुख्य केंद्र बन गएअसमानता के दर्द से पीड़ित कौन है, इसकी सबसे ज्यादा पीड़ा किन्हें है तथा इस समस्या से निजात कैसे मिले वगैरह-वगैरह।

असमानता से संबंधी चिन्ताएं (Inequality Concerns):-

➥ नवीनतम न्यू वर्ल्ड वेल्थ (जोहान्सबर्ग स्थित एक कंपनी) की रिपोर्ट में कहा गया है कि, वैश्विक स्तर पर भारत दुनिया का दूसरा सबसे असमानता वाला देश बन गया है, जहां धनपति देश की कुल परिसंपत्ति का 54 प्रतिशत नियंत्रित करते हैं।

➥ 5,600 बिलियन यूएस डॉलर की कुल व्यक्तिगत परिसंपत्तियों के साथ, यह दुनिया के 10 सबसे अमीर देशों में से एक है। फिर भी, औसत भारतीय अपेक्षाकृत गरीब हैं।

➥ यदि हम भारत की जापान के साथ तुलना करें तो जापान की (दुनिया का सबसे समानता वाला देश) स्थिति भी बदतर दिखती है, जहां धनपतियों के हाथों में केवल 22 प्रतिशत परिसंपत्तियों का ही नियंत्रण है।

➥ हम भारत की असमानता से संबंधित ‘क्रेडिट सुइस’ (Credit Suisse) के नवीनतम आंकड़ों पर नजर डाल सकते हैं:-

  1. सबसे धनी एक प्रतिशत हाथों में देश की 53 प्रतिशत परिसंपत्ति का नियंत्रण है।
  2. सबसे धनी 5 प्रतिशत हाथों में देश की 68.6 प्रतिशत परिसंपत्तियों का नियंत्रण है, जबकि शीर्ष के दस पूंजीपतियों के हाथों में 76.3 प्रतिशत परिसंपत्तियों का नियंत्रण है।
  3. पिरामिड के दूसरे सिरे पर देश के जो अपेक्षाकृत गरीब लोग हैं उनके हाथों में देश की कुल परिसंपत्तियों का महज 4.1 प्रतिशत हिस्सा है।
  4. वर्ष 2000 में भारत के सबसे धनी 1 प्रतिशत लोगों के हाथों में देश की कुल परिसंपत्तियों के 36.8 प्रतिशत हिस्से का नियंत्रण था, जबकि सबसे शीर्ष 10 प्रतिशत लोगों की हिस्सदारी 65.9 प्रतिशत थी।
  5. उसके बाद से देश की परिसंपत्तियों में इनकी हिस्सेदारी में क्रमिक रूप से धीरे धीरे इजाफा होता रहा।
  6. शीर्ष 1 प्रतिशत की हिस्सेदारी बढ़कर अब 50 प्रतिशत हो गई है।
  7. भारत की स्थिति अमेरिका के मुकाबले खराब दिखती है जहां देश की कुल परिसंपत्ति में सबसे अमीर 1 प्रतिशत लोगों का हिस्सा 37.3 प्रतिशत है।
  8. भारत के धनपतियों को अभी लंबा सफर तय करना पड़ेगा तब कहीं रूस की बराबरी कर पायेंगे जहां देश के शीर्ष धनी 1 प्रतिशत लोगों के पास सर्वाधिक 70.3 प्रतिशत परिसंपत्तियों का नियंत्रण है।

➥ नवीनतम भारत मानव विकास सर्वेक्षण (आईएचडीएस), जिसने आय असमानता से संबंधित आंकड़े पहली बार पेश किए हैं, के अनुसार भारत की आय समानता रूस, संयुक्त – राज्य अमेरिका, चीन और ब्राजील के मुकाबले कम और केवल दक्षिण अफ्रीका की तुलना में अधिक समतावादी है।

असमानता पर निगरानी रखने की जरूरत है:-
(Inequality Needs to be Checked)

➥ हालांकि असमानता सर्वव्यापी है, इसकी चरम स्थिति अर्थव्यवस्थाओं को बहु-आयामी नुकसान पहुंचाता है।

➥ ऑक्सफैम के अनुसार, भारत में और दुनिया भर के दूसरे देशों में असमानता में तेजी से वृद्धि नुकसानदायी है और देश की सरकारों को इसे रोकने के प्रयास करने की जरूरत है।

➥ बढ़ती असमानता के राष्ट्रों में कई नकारात्मक परिणामकारी होंगे-गरीबी उन्मूलन की गति धीमी हो सकती है, आर्थिक विकास की स्थिरता को चुनौती मिल सकती है, पुरुषों और महिलाओं के बीच असमानता को कई गुना बढ़ा सकती है और स्वास्थ्य, शिक्षा जीवन की समग्र संभावनाओं में असामानता बढ़ा सकती है।

विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) का ‘वैश्विक जोखिम रिपोर्ट 2016’ (श्रृंखला में तीसरी बार) में आने वाले दशक में ‘गंभीर आय असमानता’ को शीर्ष वैश्विक जोखिमों में से एक होने की आशंका जताई गई है।

➥ साक्ष्य यह भी दर्शाया है कि आर्थिक असमानता मानसिक स्वास्थ्य एवं सामाजिक समस्याओं, जैसे-मानसिक रुग्णता एवं हिंसक अपराध, से भी जुड़ी हैं।

➥ यह अमीर और गरीब दोनों देशों के लिए सच है। मूल रूप से, असमानता केवल गरीबों को ही नहीं, बल्कि सभी को आहत करती है।

समाधान की तलाश:-
(Searching for the Remedies)

➥ लेकिन सवाल यह है कि क्या असमानता अपरिहार्य है? जवाब है ‘नहीं’।

➥ यह नीति विकल्पों का परिणाम है।

➥ सरकार कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाकर असमानता में अभिवृद्धि की स्थिति को उलट सकती है,

➥ जैसे-बाजार कट्टरवाद को खारिज करना, शक्तिशाली अभिजात वर्ग के विशेष हितों का विरोध करना और इस स्थिति में नेतृत्व करने वाले नियमों और प्रणालियों को बदलना।

➥ सरकारों को ऐसे सुधारों को लागू करने की आवश्यकता है जो धन और शक्ति को पुनर्वितरित करे, और असमानता के उबड़-खाबड़ मैदान समतल कर सके।

दो मुख्य क्षेत्र ऐसे हैं जहां नीति में परिवर्तन आर्थिक समानता को प्रोत्साहित कर सकता है, ये हैं कराधान और सामाजिक खर्चः-

1. प्रगतिशील कराधानः

  1. इस संबंध में प्रगतिशील कराधान विधि काफी प्रभावी साबित हुई है।
  2. कराधान नियमों की इस पद्धति में निगम और सबसे अमीर व्यक्ति अपनी आय पर राज्य को अधिक कर देते हैं।
  3. आय पर कर से प्राप्त आय में अभिवृद्धि सरकारों को संपूर्ण समाज में गरीब लोगों के लिए संसाधनों को पुनर्वितरित करने में सक्षम बनाता है।
  4. इसी तरह, बेहतर अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था सरकार की आमदनी को बड़े पैमाने पर बढ़ा सकते हैं- जैसा कि भारत के प्रस्तावित जीएसटी से किया जा रहा है।
  5. असमानता को कम करने में कराधान की भूमिका को ओईसीडी और विकासशील देशों में अब तक एक बहुत ही तार्किक तरीके से प्रलेखित किया गया है।
  6. इस प्रकार, समुचित कराधान इस दिशा में एक बड़ी भूमिका निभा सकता है।
  7. नवीनतम ऑक्सफैम रिपोर्ट (2017 के प्रारंभ में) के अनुसार, कर के मामले में भारत का प्रदर्शन अपेक्षाकृत खराब रहा है।
  8. भारत का कुल कर संग्रह सकल घरेलू उत्पाद का 16.7 प्रतिशत है, जबकि इसकी क्षमता 53 प्रतिशत है।
  9. इसकी कर संरचना बहुत प्रगतिशील नहीं है क्योंकि कुल कर में प्रत्यक्ष कर की हिस्सेदारी केवल एक-तिहाई है।
  10. तुलनात्मक रूप से, दक्षिण अफ्रीका ने करों के रूप में जीडीपी के 27.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है, जिनमें से 50 प्रतिशत प्रत्यक्ष कर हैं।
  11. वैसे भारत सरकार ने प्रत्यक्ष कर की हिस्सेदारी को बेहतर करने के लिए वित्तीय वर्ष 2017-18 में इसमें कुल कर संग्रहण के लगभग 60 प्रतिशत अभिवृद्धि का लक्ष्य निर्धारित कर रखा है।

2. सामाजिक व्ययः

  1. सार्वजनिक सेवाओं पर सरकारों द्वारा किया गया खर्च असमानता को कम करने में चमत्कार कर सकते है।
  2. भारत में, सरकार द्वारा किए गए ऐसे किसी भी खर्च को सामाजिक क्षेत्र में हुए खर्च के रूप में इंगित किया जाता है, जिसमें शिक्षा, पोषण, भोजन, स्वच्छता, सामान्य स्वास्थ्य की देखभाल और सामाजिक संरक्षण पर निधि आवंटन शामिल हैं।

ऑक्सफैम ने 150 देशों (अमीर एवं गरीब) से भी अधिक से संकलित तीन दशकों के साक्ष्यों से प्रमाणित किया है कि सार्वजनिक सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा में समग्र निवेश असमानता से निपट सकते हैं।
➥ समूह ने, विगत कई वर्षों से पूरे देश में स्वतंत्र और सार्वभौमिक सार्वजनिक सेवाओं के लिए अभियान चलाया ऑक्सफैम की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक, स्वयं के सामाजिक क्षेत्र के खर्च (केंद्र और राज्यों को एक साथ रखा गया) के सामने भारत का प्रदर्शन खराब है।
➥ भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3 प्रतिशत शिक्षा के क्षेत्र में और लगभग 1.1 प्रतिशत स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में (हालांकि यह आंकड़ा 1.4 प्रतिशत तक बढ़ा है) खर्च करता है।
➥ तुलनात्मक रूप से देखें तो, दक्षिण अफ्रीका शिक्षा (6.1 प्रतिशत) पर दो गुना से भी ज्यादा और स्वास्थ्य पर तीन गुना से भी ज्यादा (3.7 प्रतिशत) खर्च करता है।
➥ हालांकि दक्षिण अफ्रीका भारत की तुलना में अधिक असमानता वाला देश है, यह असमानता को कम करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता में बेहतर प्रदर्शन करता है।

निष्कर्ष (Conclusion):-

➥ हाल के वर्षों में, भारत सरकार देश में चिंताजनक उच्च असमानता के मुद्दे पर अधिक संवेदनशील हो गई है और इसे बढ़ने से रोकने के लिए उपयुक्त कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है।

➥ न सिर्फ कुछ प्रभावी अधिकार-आधारित योजनाएं हाल ही के दिनों में शुरू की गई हैं बल्कि सरकार ने आधार, जन-धन योजना और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण आदि की मदद से लाभार्थियों और वितरण की उचित पहचान से संबंधित मुद्दों को हल करने की कोशिश की है।

➥ सरकार पहले से ही कर व्यवस्था में सुधार के रास्ते पर है।

➥ हाल ही में उच्च मूल्य वाले मुद्रा नोटों के विमौद्रीकरण को भी हम इसी श्रेणी में रखते हैं, जबकि 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण से आने वाली सार्वभौमिक मूल आय (यूबीआई) का प्रस्ताव बहुत नवोन्मेषी है (मार्च 2017 के शुरुआत में, सरकार ने इसके प्रति भी अपनी सइच्छा दिखाई है)।

➥ चरम गरीबी को समाप्त करना चूंकि स्थायी विकास लक्ष्यों (एसडीजी) में से एक है, यह प्रतीत होता है कि असमानता को दूर करने की दिशा में यह उचित समय पर उठाया गया सही कदम है।

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